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Kailash Pandit
Srimad Bhagavad Gita Pratham Adhyay Ka Mahatmya

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श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायन वासु देवा
बन्सी वजईया रास रचईया श्री कृष्ण भगवाने की जै
प्रिय भक्तो श्री मत भगवत गीता के पहले अध्याय का महात्म सुनाने जा रहा हूँ
सत्तचित से सुनेंगी तो आनन्द के साथ कल्यान भी होगा
तो बोले श्री कृष्ण भगवाने की जै
एक समय कैलाश परवत पर महादेव जी से पारवती जी ने पूछा
हे प्राणनात आप किस ज्ञान से इतने पवित्र हुए हो
कि आपको संसार के लोग परम पवित्र शिवशंकर मान कर पूछते हैं
आप तो मुरकशाला ओड़े अंगों में शम्शान की भभूत लगाए
गले में सर्पों और मुन्नों की माला पहन रहे हो
इन में तो कोई कर्म पवित्र नहीं
अते है आप मुझे वह ज्ञान सुनाओ जिस से आप पवित्र हो
शिरी महदेव जी ने उत्तर दिया
प्रिये सुनो
जिस ज्ञान को मन में धारन करने से मैं पवित्र हुआ हूँ
उस ज्ञान से मुझे बाहर के कर्म प्रभावित नहीं करते
शिव जी बोले
एक समय शेष शैया पर शी
नारायन जी नेत्र बंद कर
अपने आनन्द में मगने थे
भगवान के चरण दबाते हुए
शी लक्ष्मी जी ने पूछा
ही प्रभू
निद्रा और आलश्य
उन पुर्शों को व्यापता है
जो तामसी है
आप तो तीनों गुणों से परे हो
फिर भी आप नेत्र बंद किये हो
यह मुझको बड़ा आश्चरिय है
शी नारायन जी बोले
हे लक्ष्मी
मुझको निद्रा और आलश्य
नहीं व्यापता
भगवत गीता में
जो ज्यान है
उसके आनन्द में मगन रहता हूँ
जैसे सोले अवतार
मेरे आधार रूप है
वैसे ही ये गीता
शब्द रूपी अवतार है
इसके पांच अध्याय
मेरे मुख है
पांच अध्याय मेरी भुजाएं है
पांच अध्याय
मेरा हिर्दय और मन है
सोहलवा अध्याय
मेरा उदर है
सत्रमा अध्याय
मेरी जांगे है
और अठारवा अध्याय चरण है
इसमें जितने स्लोक है
मेरी नाडिया है
और जो अक्षर है
मेरे रोम है
ऐसा जो मेरा शब्द रूपी गीता ज्ञान है
उसके अर्थ को मैं हिरदे में विचारता हूँ
और बहुत आनंद पाता हूँ
तब लक्ष्मी जी कहने लगी
हे नारायन
जब श्री गीता जी का ऐसा ज्ञान है
तो उसको सुनकर कोई जीव कृतार्थ भी हुआ है
तब श्री नारायन जी ने कहा
हे लक्ष्मी
गीता के ज्ञान को सुनकर
बहुत से जीव कृतार्थ हुए है
और आगे भी होते रहेंगे
एक प्राचीन इतिहास सुनाते हुए
भगवान विश्णू ने कहा
हे लक्ष्मी
शुद्र वर्ण का एक व्यक्ति
चांडालों के कर्म करता था
और तेल लवन का व्यावार करता था
उसने एक बकरी पाली
एक दिन वे बकरी चराने को वन में गया
और वक्षों के पत्ते तोड़ने लगा
वहां सांप ने उसको डस लिया
और वह तुरंत मर गया
मर कर उस प्राणी ने
बहुत से नरक भोगे
और फिर बैल की यो नहीं पाई
उस बैल को एक भिक्षुक ने खरीद लिया
भिखारी उस बैल पर चड़कर
सारे दिन मांगता फिरता
और कुछ भिक्षा मांगकर लाता
वह अपने कुटुम के साथ मिलकर खाता
बैल सारी रात द्वार पर बंधा रहता
उसके खाने पीने की कोई ख़वर न लेता
इस प्रकार कई दिन बीते
तो वह बैल भूख के मारे गिर पड़ा
वह मरने लगा
परन्त उसके प्राण नहीं छूटते थे
एक दिन एक गणिका आई
उसने लोगों से पूछा ये भीड कैसी है
एक व्यक्ति ने कहा
इस बैल के प्राण छूटते नहीं है
अनेक पुन्यों का फल दे रहे हैं
तो भी इसकी मुक्ति नहीं होती
तब गणिका ने कहा
मैंने जो कर्म किया
उसका फल मैंने इस बैल के निमित्त कर दिया
इतना कहते ही
उस बैल की मुक्ति हो गई
अगले जन्म में
उस बैल ने ब्राह्मन के घर में जन्म लिया
पिता ने उसका नाम सुशर्मा रखा
उसको पिछले जन्म की याद थी
अते उसने एक दिन मन में सोचा
कि जिस गणिका ने मुझे बैल की योणी से छुडाया था
उसके दर्शन करो
प्रिये
चलता चलता गणिका के घर चला गया
और कहा
तु मुझे पैचानती है
गणिका ने कहा
मैं नहीं जानती तु कौन है
क्योंकि तु विप्र है
और मैं वैश्या
तब विप्र ने कहा
मैं वही बैल हूँ
जिसको तुने अपना पुन्य दिया था
तब मेरी मुक्ती हुई थी
तब मैंने विप्र के घर जन्म लिया है
तु अपना पुन्य बता
वैश्या ने कहा
मैंने अपनी याद में कोई पुन्य नहीं किया
परन्तु मेरे घर एक तोता है
वे सवेरे कुछ पढ़ता है
मैं उसके वाक्य सुनती हूँ
उसी पुन्य का फल मैंने तेरे निमित कर दिया था
तवस विपर ने तोते से पूछा
कि तु सवेरे सवेरे क्या पढ़ता है
तोते ने कहा
मैं पिशले जन्म में विपर था
पिता ने मुझे गीता के पहले अध्याय का पाठ पढ़ाया था
एक दिन मैंने अग्यानवश गुरु का पान कर दिया
तब गुरु जी ने मुझे शाब दिया
और मैं तोता बन गया
एक विपर ने मुझे मोल लिया
वै विपर भी अपने पुत्र को गीता का पाठ पढ़ाता था
तब मैंने भी वै पाठ सीख लिया
एक दिन ब्रह्मन के घर चोर आए
उन्हें धन प्राप्त न हुआ
पिंजरा उठा कर ले गए
उन चोरों की या गणी का मित्र थी
मुझे इसके पास ले आए
मैं नित्य गीता जी के पहले अध्याय का पाठ करता हूँ
और यह सुनती है
वही पुन्य तेरे निमित्य दिया था
तब विपर ने कहा
हे तोते
मेरे आशिर्वाज से तिरा कल्यान हो
इतना कहने से
तोते की मुक्ती हो गई
उस गणिका ने भले कर्म ग्रहन किये
और नित्य प्रती स्नान कर
गीता के प्रथम अध्याय का पाठ करने लगी
बाद में तो ब्रह्मन, शत्रिय, वैश्य
सभी उस वैश्या की पूजा करने लगे
श्री नारायन जी ने अंत में कहा
हे लक्षमी
जो कोई गीता का पाठ करे
या श्रवन करे
उसको भी मुक्ती मिलेगी
यह पहले अध्याय का महत्म
मैंने तुम से कहा
इती श्री पदम पुराने
गीता महात्म नाम
प्रथम अध्याय संपूनम
बोले शी किष्ण भगवाने की
जै
प्रिय भगतो
इस प्रकार यहाँ पर
श्री मत भगवत गीता के
गीता महात्म का
यह अध्याय समाप्त होता है
बोले शी किष्ण भगवाने की
जै
ओम नमों भगवते
वासु देवाए नमहा
नमहा
बन्सी वजईया रास रचईया श्री कृष्ण भगवाने की जै
प्रिय भक्तो श्री मत भगवत गीता के पहले अध्याय का महात्म सुनाने जा रहा हूँ
सत्तचित से सुनेंगी तो आनन्द के साथ कल्यान भी होगा
तो बोले श्री कृष्ण भगवाने की जै
एक समय कैलाश परवत पर महादेव जी से पारवती जी ने पूछा
हे प्राणनात आप किस ज्ञान से इतने पवित्र हुए हो
कि आपको संसार के लोग परम पवित्र शिवशंकर मान कर पूछते हैं
आप तो मुरकशाला ओड़े अंगों में शम्शान की भभूत लगाए
गले में सर्पों और मुन्नों की माला पहन रहे हो
इन में तो कोई कर्म पवित्र नहीं
अते है आप मुझे वह ज्ञान सुनाओ जिस से आप पवित्र हो
शिरी महदेव जी ने उत्तर दिया
प्रिये सुनो
जिस ज्ञान को मन में धारन करने से मैं पवित्र हुआ हूँ
उस ज्ञान से मुझे बाहर के कर्म प्रभावित नहीं करते
शिव जी बोले
एक समय शेष शैया पर शी
नारायन जी नेत्र बंद कर
अपने आनन्द में मगने थे
भगवान के चरण दबाते हुए
शी लक्ष्मी जी ने पूछा
ही प्रभू
निद्रा और आलश्य
उन पुर्शों को व्यापता है
जो तामसी है
आप तो तीनों गुणों से परे हो
फिर भी आप नेत्र बंद किये हो
यह मुझको बड़ा आश्चरिय है
शी नारायन जी बोले
हे लक्ष्मी
मुझको निद्रा और आलश्य
नहीं व्यापता
भगवत गीता में
जो ज्यान है
उसके आनन्द में मगन रहता हूँ
जैसे सोले अवतार
मेरे आधार रूप है
वैसे ही ये गीता
शब्द रूपी अवतार है
इसके पांच अध्याय
मेरे मुख है
पांच अध्याय मेरी भुजाएं है
पांच अध्याय
मेरा हिर्दय और मन है
सोहलवा अध्याय
मेरा उदर है
सत्रमा अध्याय
मेरी जांगे है
और अठारवा अध्याय चरण है
इसमें जितने स्लोक है
मेरी नाडिया है
और जो अक्षर है
मेरे रोम है
ऐसा जो मेरा शब्द रूपी गीता ज्ञान है
उसके अर्थ को मैं हिरदे में विचारता हूँ
और बहुत आनंद पाता हूँ
तब लक्ष्मी जी कहने लगी
हे नारायन
जब श्री गीता जी का ऐसा ज्ञान है
तो उसको सुनकर कोई जीव कृतार्थ भी हुआ है
तब श्री नारायन जी ने कहा
हे लक्ष्मी
गीता के ज्ञान को सुनकर
बहुत से जीव कृतार्थ हुए है
और आगे भी होते रहेंगे
एक प्राचीन इतिहास सुनाते हुए
भगवान विश्णू ने कहा
हे लक्ष्मी
शुद्र वर्ण का एक व्यक्ति
चांडालों के कर्म करता था
और तेल लवन का व्यावार करता था
उसने एक बकरी पाली
एक दिन वे बकरी चराने को वन में गया
और वक्षों के पत्ते तोड़ने लगा
वहां सांप ने उसको डस लिया
और वह तुरंत मर गया
मर कर उस प्राणी ने
बहुत से नरक भोगे
और फिर बैल की यो नहीं पाई
उस बैल को एक भिक्षुक ने खरीद लिया
भिखारी उस बैल पर चड़कर
सारे दिन मांगता फिरता
और कुछ भिक्षा मांगकर लाता
वह अपने कुटुम के साथ मिलकर खाता
बैल सारी रात द्वार पर बंधा रहता
उसके खाने पीने की कोई ख़वर न लेता
इस प्रकार कई दिन बीते
तो वह बैल भूख के मारे गिर पड़ा
वह मरने लगा
परन्त उसके प्राण नहीं छूटते थे
एक दिन एक गणिका आई
उसने लोगों से पूछा ये भीड कैसी है
एक व्यक्ति ने कहा
इस बैल के प्राण छूटते नहीं है
अनेक पुन्यों का फल दे रहे हैं
तो भी इसकी मुक्ति नहीं होती
तब गणिका ने कहा
मैंने जो कर्म किया
उसका फल मैंने इस बैल के निमित्त कर दिया
इतना कहते ही
उस बैल की मुक्ति हो गई
अगले जन्म में
उस बैल ने ब्राह्मन के घर में जन्म लिया
पिता ने उसका नाम सुशर्मा रखा
उसको पिछले जन्म की याद थी
अते उसने एक दिन मन में सोचा
कि जिस गणिका ने मुझे बैल की योणी से छुडाया था
उसके दर्शन करो
प्रिये
चलता चलता गणिका के घर चला गया
और कहा
तु मुझे पैचानती है
गणिका ने कहा
मैं नहीं जानती तु कौन है
क्योंकि तु विप्र है
और मैं वैश्या
तब विप्र ने कहा
मैं वही बैल हूँ
जिसको तुने अपना पुन्य दिया था
तब मेरी मुक्ती हुई थी
तब मैंने विप्र के घर जन्म लिया है
तु अपना पुन्य बता
वैश्या ने कहा
मैंने अपनी याद में कोई पुन्य नहीं किया
परन्तु मेरे घर एक तोता है
वे सवेरे कुछ पढ़ता है
मैं उसके वाक्य सुनती हूँ
उसी पुन्य का फल मैंने तेरे निमित कर दिया था
तवस विपर ने तोते से पूछा
कि तु सवेरे सवेरे क्या पढ़ता है
तोते ने कहा
मैं पिशले जन्म में विपर था
पिता ने मुझे गीता के पहले अध्याय का पाठ पढ़ाया था
एक दिन मैंने अग्यानवश गुरु का पान कर दिया
तब गुरु जी ने मुझे शाब दिया
और मैं तोता बन गया
एक विपर ने मुझे मोल लिया
वै विपर भी अपने पुत्र को गीता का पाठ पढ़ाता था
तब मैंने भी वै पाठ सीख लिया
एक दिन ब्रह्मन के घर चोर आए
उन्हें धन प्राप्त न हुआ
पिंजरा उठा कर ले गए
उन चोरों की या गणी का मित्र थी
मुझे इसके पास ले आए
मैं नित्य गीता जी के पहले अध्याय का पाठ करता हूँ
और यह सुनती है
वही पुन्य तेरे निमित्य दिया था
तब विपर ने कहा
हे तोते
मेरे आशिर्वाज से तिरा कल्यान हो
इतना कहने से
तोते की मुक्ती हो गई
उस गणिका ने भले कर्म ग्रहन किये
और नित्य प्रती स्नान कर
गीता के प्रथम अध्याय का पाठ करने लगी
बाद में तो ब्रह्मन, शत्रिय, वैश्य
सभी उस वैश्या की पूजा करने लगे
श्री नारायन जी ने अंत में कहा
हे लक्षमी
जो कोई गीता का पाठ करे
या श्रवन करे
उसको भी मुक्ती मिलेगी
यह पहले अध्याय का महत्म
मैंने तुम से कहा
इती श्री पदम पुराने
गीता महात्म नाम
प्रथम अध्याय संपूनम
बोले शी किष्ण भगवाने की
जै
प्रिय भगतो
इस प्रकार यहाँ पर
श्री मत भगवत गीता के
गीता महात्म का
यह अध्याय समाप्त होता है
बोले शी किष्ण भगवाने की
जै
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वासु देवाए नमहा
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