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Kailash Pandit
Shiv Mahapuran Vighneshwar Sanhita Adhyay-19, 20

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बोले शिवशंकर भगवान की जैने
प्रिये भक्तों
श्री शिव महा पुरान के विद्ध्विश्व सहीता की अगली कथा है
पार्थिव लिंग के निर्मान की रीती
तथा वेद मंत्रों द्वारा
उसके पूजन की विस्त्रतेवं
संख्षिप्त विधी का वर्णन
तो आईये भग्तों आरंब करते हैं इस कथा के साथ उननीस और बीसमा अध्याय
तद अंतर
पार्थिव लिंग की स्चिष्ठता
तथा महिमा का वर्णन करके सूद्जी कहते हैं
अगर वेदिक कर्म के प्रती शद्धा भक्ती रखने वाले लोगों के लिए
वेदोगतमार से ही पार्थिव पूजा की पद्धती का वर्णन करता हूं
यह पूजा भोग और मोक्ष दोनों को देने वाली है
अहिनिक सूत्रों में बताई हुई विधी के अनुसार
वेधी पूर्वक स्नान और संध्यो पास्थना करके पहले ब्रम यज्य करें
तब पश्चात देवताओं,
रिशीयों,
संकाधी मनुश्यों और पित्रों का तरपण करें
अपनी रुची के अनुसार संपून नित्य करम को पूर्ण करके
शिव इस्मरन पूर्वक भस्म तथा रुद्राक्ष धारन करें
तत्पश्चात संपून मनुवान्चित फल की सिध्धी के लिए उची भक्ती भावना
के साथ उठम पार्थिवलिंग की वेदोक्त विधी से भली भाती पूजा करें
नदी या तालाभ के किनारे पर्वद पर वन में शिवाले में अथवा
और किसी पवित्र स्थान में पार्थिव पूजा करने का विधान है
हे ब्राह्मणों शुद्ध इस्थान से निकालिए हुए मिट्टी को यत्नपूर्वक लाकर
बड़ी सावधानी के साथ शिवलिंग का निर्मान करें
ब्राह्मण के लिए श्वेत,
क्षत्रिय के लिए लाल,
वैश्य के लिए पीली,
शुद्ध के लिए काली मिट्टी से शिवलिंग बनाने का विधान है
अथवा जहां जो मिट्टी मिल जाए उसी से शिवलिंग बनाए
शिवलिंग बनाने के लिए प्रेत्न पूर्वक मिट्टी का संघ्रह
करके उस शुब मिट्टीका को अत्यंत शुद्ध इस थान में रखें
फिर उसकी शुद्धी करके जल से सान कर पिंडी वना लें और वेदोगत
मार्ग से धीरे धीरे सुन्दर पार्थिवलिंग की रचना करें।
तद पश्चात भोग और मोक्ष रूपी फल की प्राप्ती के लिए भक्ती पूर्वक
उसका पूजन करें।
उस पार्थिवलिंग के पूजन की जो विधी है उसे मैं
विधान पूर्वक बता रहा हूं। तुम सब लोग सुनो।
ओम्नमहाशिवाय।
इस मंत्र का उच्छारन करते हुए समस्त पूजन सामक्री का प्रोक्षन करें।
उस पर जल च्ढड़ के इसके बाद
भूरसी।
इसका पूरा मंत्र है।
भूरसी भूमी रहेश्य दितिरसी विश्वधाया विश्वस्य भूनस्यधत्री
पित्वियं यच्छ प्रित्वीम द्रिह प्रित्वीमा हि अन्सिही।
इस परकार
उसके बाद भूरसी इत्यादी मंत्र से ख्षेत्र सिध्धी करें।
फिर
आपोह इस्मानहा। इसका पूरा मंत्र है भगतों।
आपोह इस्मानहा मात्रः शुद्य यंतू ग्रतेने नो ग्रतप्यह पुरंतु।
वेश्वः रिप्रहं प्रवहंति देवी रुदि राभ्याय रुचिराः पूतयेमी।
यजुरवेद गे इस मंत्र के द्वारा जल का संसकार करें।
उसके बाद नमस्कार रुद्र।
इस मंत्र से
इस फाटिका बंध
अर्थाथ इस फाटिक शिला का घेरा
बनाने की बाद कही गई है।
नमह
शंभवाय
इस मंत्र से ख्षेत शुद्धी और पंचाम्रत का प्रोक्षन करें।
अध्वश्चात शिवभख्त पुनह नमह पूर्वक नील ग्रिवाय
मंत्र से शिवलिंग की उत्तम् प्रतिष्ठा करें।
इसके बाद वैदिक रीती से पूजन कर्म करने वाला उपासक भक्ती पूर्वक
एतत्ते रुद्रावसम् इस मंत्र से रमनी आसं दे।
आणो महान्तमह इस मंत्र से आवाहन करें।
याते रुद्रः इस मंतर से भगवान शिव को आसं पर
समासीन करें।
यामिशुहुम
इस मंतर से शिव के अंगों में न्यास करें।
इस मंतर से प्रेम पूर्वक
विधी वासन करें।
इस मंतर से शिव लिंग में ईश्ट देवता शिव का न्यास करें।
असोहो योवावसर्पतिही। इस मंतर से उपसर्पन अर्थात
देवता के समीप गमन करें। और इसके पशात नमस्तो नील
ग्रिवायः। इस मंतर से ईश्ट देव को पाध समर्पित करें।
रुद्र गायत्रिः
से अर्ग दे। त्रियंबकम् मंतर से आच्मन करें। पयपित्वियाम्।
इस मंतर से दुग्द इसनान कराएं। दधी कान्यो हो। इस मंतर से
दधी इसनान कराएं।
ग्रतम् ग्रतपावाम्। इस मंतर से ग्रत इसनान कराएं।
मधुवाता,
मधुनक्तम्,
मधुमान्नो।
इन तीन दुचाओं से मधुईसनान और सरकराईसनान कराएं।
इन दुग्द आधी पांच वस्तों को पंचायम्रत कहते हैं अथ्वा पाध समर्पन के
लिए कहे गए नमास्तो नेल गिरिवाय इत्यादी मंतर दुआरा पंचायम्रत से स्नान
कराएं। तद अंतर मानस्तो के हे।
इस मंतर से प्रेम पूर्वग भगवान शिव को कटी बध अर्थाद करधनी अरपित करें।
नमो ध्रिशन वे इस मंतर का उच्छारण करके
आराध्य देवुता को उत्रिय धारन कराएं।
याते हेति इत्यादी चार रिचाओं को पढ़कर
वेदग्य भकती प्रेम से विधी पूर्वग भगवान शिव
के लिए वस्त्रेवं यज्यो पवित समर्पित करें।
और इसके बाद नमहा स्वभ्याह इत्यादी मंतर को पढ़कर शुद्ध
बुध्धी वाला भकत पुरुष भगवान को प्रेम पूर्वग गंध,
सुगंधिचंडन एवं रोली चढ़ाएं।
वस्त्रे Student,
नमस्तक्षभ्यो।
इस मन्तु्र से एकशत अरपित करें।
नमहा परियायSince
इस मन्तुर से फूलचड़ाएं।
नमहा परणाएं
इस मंतु।।। развंदிे कयों करें ?
पूर्वक्त धूप दें नमा आश्वे इस रिचा से
शास्त्रोक्त विधी के अनुसार दीप निवेदन करें
तद पश्याद हात धोकर
नमों जेश्ठाय इस मंतर से उत्तम नयवध्य अरपित करें
फिर पूर्वक्त त्रियंबक मंतर से आच्चमन कराएं इमारुद्राय
इस रिचा से फल समर्पन करें फिर नमों व्रज्जाय
इस मंतर से भगवान शिव को अपना सब कुछ समर्पित कर दें
इन पूर्वक्त दो मंतरों द्वारा
केवल अक्षतों से ग्यारे रुद्र का पूजन करें
और फिर हिरन गरभ्याह इत्यादी मंतर से जो तीन रिचाओं के रूप में पठित हैं
दक्षना चढ़ावें
देवस्यत्वा इस मंतर से विद्वान पुरुष आराज्जदेव का अभिशेक करें
दीप के लिए बताय हुए नमहें आश्वे इत्यादी मंतर से भगवान शिव की निराजना
अर्थात आरती करें
तत्पश्यात
इमा रुद्राय
इत्यादी तीन रिचाओं से भक्ति पूर्वक रुद्र देव को पुष्पांजली अरपित करें
तुमानो माहान्तामाह इस मंतर से विज्य
उपासक पूजनिय देवताओं की परिक्रमा करें
फिर उठम बुद्धि वाला उपासक
माने स्तोके इस मंतर से भगवान को साश्टांग परणाम करें
एस मान्तर से सिव मुद्रा का पेरदशन करें
इस रिचा द्वारा धेनु मुद्रा दिखाएं। इस तरहें पांच
मुद्राओं का परदर्शन करके शिव सम्मंधी मुद्राओं का जप करें।
तथा वेदग्यपुरुष शत्रुद्रियह मंत्र की आवर्ती करें।
तथ पश्यात वेदग्यपुरुष पंचांग पाठ करें। तद अंतर
देवा गातु इत्यादी मंत्र से
भगवान शंकर का विसरजन करें।
इस प्रकार शिव पूजा की वैदिक विधी का विस्तार से प्रतिपादन किया गया है।
हे महरशियो,
अब संख्षेब से भी पार्थिव
पूजन की वैदिक विधी का वर्णन सुनो।
इस रिचा से
पार्थिव लिंग बनाने के लिए मिट्टी ले आए।
वाम देवाए। इत्यादी मंत्र पढ़कर
उसमें जल डालें।
जब मिट्टी संकर तयार हो जाए तब।
इस मंत्र से लिंग निर्मान करें।
देव तत्पुरुशाय। इस मंत्र से विधीवत
उसमें भगवान शिव का आवाहन करें। तद अंतर
ईशानह। मंत्र से भगवान शिव को वेदी पर इस्थापित करें। इनके सिवाई
अन्य सब विधानों को भी शुद्ध बुधी वाला उपासक संक्षेप में ही संप
गुरु के दिये हुए अन्य किसी शिव सम्मंधी मंत्र से
सोले उपचारों द्वारा
विधीवत पूजन करें। अथवा
भवाय भवनाशाय महादेवाय धीमही उग्राय उग्रणाशाय शर्वाय शशी मोलिने।
इस मंत्र द्वारा विध्वान उपासक भगवान शिव की पूजा करें।
वे भ्रम छोड़कर उत्तम भाव भक्ती से शिव की आराधना करें।
क्योंकि भगवान शिव भक्ती से ही मनुवाणचित फल देते हैं।
हे ब्रहमनों,
यहां जो वैदिक विधी से पूजन का करम बताया गया है,
इसका पूर्ण रूप से आदर करता हुआ,
मैं पूजा की एक दूसरी विधी भी बता रहा हूं,
जो उत्तम होने के साथ ही
सर्व साधारन के लिए उप्योगी है।
हे हे मुनीवरो,
पार्थिवलिंग की पूजा भगवान शिव के नामों से बनाई गई है,
वैं पूजा संपूर्ण अभिष्टों को देने वाली है,
मैं उसे बताता हूं, सुनो।
हर महिश्वर,
शंभु,
शूल पानी,
पिनाक ध्रक,
शिव पशुपती और महादेव,
ये करमशेषिव के आठ नाम कहे गए हैं,
इन में से प्रत्थम नाम के द्वारा
अर्थात ओम हरायिन नमहा
का उच्छारण करके पार्थिवलिंग बनाने के लिए पूजा भगवान शि
ये मिट्टी लाएं
दूसरे नाम अर्थात ओम महिश्वरायिन नमहा
का उच्छारण करके लिंग निर्मान करें फिर ओम शंभवेइन नमहा
बोलकर उस पार्थिवलिंग की पिर्थिष्ठा करें तद पश्यात
ओम शूल पानी ये नमहा
कहकर उस पार्थिवलिंग में भगवान शिव का आवाहन करें
ओम पिनाक ग्रशे नमहा
कहकर उस शिवलिंग को नहलाएं
ओम शिवाये नमहा
बोलकर
उसकी पूजा करें
फिर ओम पशुपतिये नमहा
कहकर ख्षमा प्रार्थना करें और अंत में ओम महादेवाये नमहा
कहकर आराद्य देव का विशरजन कर दें
प्रतेक नाम के आद में ओमकार और अंत में चतुर्थी विभक्ति के साथ नमहा
पद लगाकर बड़े आनन्द और भक्ति भाव से
पूजन सम्मंधीत सारे कारिये करने चाहीं
शडखशर मंत्र से
अंगन्यास और करन्यास के विधी भली भाती संपन्य
करके फिर नीचे लिखे हुए के अनुसार ध्यान करें
जो कैलाश परवत पर एक सुन्दर सिंगहासन के मद्य भाग में विराजमान
हैं उनके वाम भाग में भगवती ऊमा उनसे सट कर बैठी हुई हैं
सनक,
सनन्दन आदी भगत जन जिनकी पूजा कर रहे हैं तता जो भगतों के
दुख रूपी दावनल को नष्ट कर देने वाले अप्रमेव शक्ति शाली
ईश्वर हैं उन विश्व विउशन भगवान शिव का चिंतन करना चाहिए
भगवान महिश्वर का प्रति दिन इस प्रकार ध्यान करें
उनकी यंग कांती चांदी के परवत की भाती गौर है वे अपने
मस्तक पर मनोहर चंद्रमा का मुकुर्ड धारन करते हैं
रत्नों के आभूशन धारन करने से उनका श्री यंग और भी उद्भासित हो उठा है
उनके चार हाथों में क्रमश है परशु,
म्रग मुद्रा,
वर तथा अभय मुद्रा सुशोबित है
वे सदा परसंद रहते हैं,
कमल के आसन पर बैठे हैं और देवता लोग
चारों और खड़े होकर उनकी स्तुती कर रहे हैं
उन्होंने वस्त्र की जगें
व्याग्र चर्म धारन कर रखा हैं
वे इस विश्व के आदी हैं,
बीज कारणरूप हैं तथा सबका समस्त भैक हर लेने वाले हैं,
उनके पाँच मुख हैं और प्रतेख मुख मंडल में तीन तीन नेत्र हैं
इस प्रकार
ध्यान तथा उठ्तम पार्थिव लिंग का पूजन करके गुरू
के दिये हुए पंचाक्षर मंत्र का विधी पूर्वक जब करें
हे विप्रवरो विद्ध्वान पुरुष को चाहिए कि वे देविश्वर शिव को
प्रणाम करके नाना प्रकार की इस्तुतियों द्वारा उनका इस्तवन करें तथा
शत्रुद्रिय गयजुरुवेद सोलवे अध्याय के मंत्रों का पाठ करें
तत्पस्चात अञ्जली में अक्षत और फूल लेकर उत्तम भक्ति भाव से
निम्णांकित मंत्रों को पढ़ते हुए प्रेम और परसन्यता
के साथ भगवान शंकर से इस प्रकार प्रार्थना करें
सबको सुख देने वाले करपा निधान भूतनात शिव मैं आपका हूँ
आपके चर्णों में ही मेरे प्राण बसते हैं
अथ्वा आपके गुण ही मेरे प्राण हैं
मेरे जीवन सरवस्यो में मेरा चित सदा आपके ही चिंतन में लगा हुआ है
यह जान कर मुझपर प्रसन हो ये
करपा कीजिए
हे शंकर
मैंने अन्जान में अथ्वा जान भूजकर
यदी कभी आपका जप और पूजन आदी किया हो
तो आपकी करपा से वै सफल हो जाए
हे गोवरीनात
मैं आधुनिक युख का महान पापी हूँ
पतित हूँ
और आप सदा से ही परम महान पतित पावन हैं
इस बात का विचार करके
आप जैसा चाहें वैसा करें
हे महादेव
हे सदासेव
वेदों
पुराणों नाना परकार के शास्त्रिय सिध्धान्तों
और विभिन्न महरश्योंने भी अप तक आपको पूर्ण रूप से नहीं जाना है
तिर मैं हग्यानी कैसे जान सकता हूँ
हे महेश्वर
मैं जैसा हूँ
वैसा ही उसी रूप में सम्पूर्ण भाव से आपका हूँ
आपके आश्रित हूँ
इसलिए आपसे रक्षा पाने के योग्य हूँ
हे परमिश्वर
आप मुझपर प्रसन्न होईए
हे हुने
इसप्रकार प्रार्थना करके
हात में लिये हुए अक्षत और पुष्प को
भगवान शिव के उपर चढ़ाकर
उन शम्भु देव को भकती भाव से
विधी पूर्वक
साश्टांग प्रणाम करें
तद अंतर शुद्ध बुध्धी वाला उपासक
शास्त्रोप्त विधी से ईश्ट देव की परिक्रमा करें
तद उपासक शुद्ध पूर्वक स्थुतियों द्वारा
देविश्वर शिव की स्थुती करें
इसके बाद गला बचाकर
गले से अव्यक्त शब्द का उच्छारन करें
पवित्र एवं विनीत चित्वाला साधक भगवान को प्रणाम करें
इरादर पूर्वक विग्यप्ति करें और इसके बाद विसर्जन
एइ मुनीवरो
इसप्रकार विधी पूर्वक पार्थिव पूजा बताई गई है
वै भोग और मोक्ष देने वाली तथा भगवान शिव
के परती भक्ती बहाव को बढ़ाने वाली है
बोलिये शिव शंकर भगवान की जै
प्रिये भक्तो इसप्रकार यहांपर
शिशिव महा पुराण के विध्विश्व संहीता की यह कता
और उननीसमा तथा बीसमा ध्याय यहांपर समाप्त होता है
तो शद्धा के साथ बोलिये
शिव शंकर भगवान की जै आननद से बोलिये ओम नमः शिवाय
ओम नमः शिवाय
ओम नमः शिवाय
प्रिये भक्तों
श्री शिव महा पुरान के विद्ध्विश्व सहीता की अगली कथा है
पार्थिव लिंग के निर्मान की रीती
तथा वेद मंत्रों द्वारा
उसके पूजन की विस्त्रतेवं
संख्षिप्त विधी का वर्णन
तो आईये भग्तों आरंब करते हैं इस कथा के साथ उननीस और बीसमा अध्याय
तद अंतर
पार्थिव लिंग की स्चिष्ठता
तथा महिमा का वर्णन करके सूद्जी कहते हैं
अगर वेदिक कर्म के प्रती शद्धा भक्ती रखने वाले लोगों के लिए
वेदोगतमार से ही पार्थिव पूजा की पद्धती का वर्णन करता हूं
यह पूजा भोग और मोक्ष दोनों को देने वाली है
अहिनिक सूत्रों में बताई हुई विधी के अनुसार
वेधी पूर्वक स्नान और संध्यो पास्थना करके पहले ब्रम यज्य करें
तब पश्चात देवताओं,
रिशीयों,
संकाधी मनुश्यों और पित्रों का तरपण करें
अपनी रुची के अनुसार संपून नित्य करम को पूर्ण करके
शिव इस्मरन पूर्वक भस्म तथा रुद्राक्ष धारन करें
तत्पश्चात संपून मनुवान्चित फल की सिध्धी के लिए उची भक्ती भावना
के साथ उठम पार्थिवलिंग की वेदोक्त विधी से भली भाती पूजा करें
नदी या तालाभ के किनारे पर्वद पर वन में शिवाले में अथवा
और किसी पवित्र स्थान में पार्थिव पूजा करने का विधान है
हे ब्राह्मणों शुद्ध इस्थान से निकालिए हुए मिट्टी को यत्नपूर्वक लाकर
बड़ी सावधानी के साथ शिवलिंग का निर्मान करें
ब्राह्मण के लिए श्वेत,
क्षत्रिय के लिए लाल,
वैश्य के लिए पीली,
शुद्ध के लिए काली मिट्टी से शिवलिंग बनाने का विधान है
अथवा जहां जो मिट्टी मिल जाए उसी से शिवलिंग बनाए
शिवलिंग बनाने के लिए प्रेत्न पूर्वक मिट्टी का संघ्रह
करके उस शुब मिट्टीका को अत्यंत शुद्ध इस थान में रखें
फिर उसकी शुद्धी करके जल से सान कर पिंडी वना लें और वेदोगत
मार्ग से धीरे धीरे सुन्दर पार्थिवलिंग की रचना करें।
तद पश्चात भोग और मोक्ष रूपी फल की प्राप्ती के लिए भक्ती पूर्वक
उसका पूजन करें।
उस पार्थिवलिंग के पूजन की जो विधी है उसे मैं
विधान पूर्वक बता रहा हूं। तुम सब लोग सुनो।
ओम्नमहाशिवाय।
इस मंत्र का उच्छारन करते हुए समस्त पूजन सामक्री का प्रोक्षन करें।
उस पर जल च्ढड़ के इसके बाद
भूरसी।
इसका पूरा मंत्र है।
भूरसी भूमी रहेश्य दितिरसी विश्वधाया विश्वस्य भूनस्यधत्री
पित्वियं यच्छ प्रित्वीम द्रिह प्रित्वीमा हि अन्सिही।
इस परकार
उसके बाद भूरसी इत्यादी मंत्र से ख्षेत्र सिध्धी करें।
फिर
आपोह इस्मानहा। इसका पूरा मंत्र है भगतों।
आपोह इस्मानहा मात्रः शुद्य यंतू ग्रतेने नो ग्रतप्यह पुरंतु।
वेश्वः रिप्रहं प्रवहंति देवी रुदि राभ्याय रुचिराः पूतयेमी।
यजुरवेद गे इस मंत्र के द्वारा जल का संसकार करें।
उसके बाद नमस्कार रुद्र।
इस मंत्र से
इस फाटिका बंध
अर्थाथ इस फाटिक शिला का घेरा
बनाने की बाद कही गई है।
नमह
शंभवाय
इस मंत्र से ख्षेत शुद्धी और पंचाम्रत का प्रोक्षन करें।
अध्वश्चात शिवभख्त पुनह नमह पूर्वक नील ग्रिवाय
मंत्र से शिवलिंग की उत्तम् प्रतिष्ठा करें।
इसके बाद वैदिक रीती से पूजन कर्म करने वाला उपासक भक्ती पूर्वक
एतत्ते रुद्रावसम् इस मंत्र से रमनी आसं दे।
आणो महान्तमह इस मंत्र से आवाहन करें।
याते रुद्रः इस मंतर से भगवान शिव को आसं पर
समासीन करें।
यामिशुहुम
इस मंतर से शिव के अंगों में न्यास करें।
इस मंतर से प्रेम पूर्वक
विधी वासन करें।
इस मंतर से शिव लिंग में ईश्ट देवता शिव का न्यास करें।
असोहो योवावसर्पतिही। इस मंतर से उपसर्पन अर्थात
देवता के समीप गमन करें। और इसके पशात नमस्तो नील
ग्रिवायः। इस मंतर से ईश्ट देव को पाध समर्पित करें।
रुद्र गायत्रिः
से अर्ग दे। त्रियंबकम् मंतर से आच्मन करें। पयपित्वियाम्।
इस मंतर से दुग्द इसनान कराएं। दधी कान्यो हो। इस मंतर से
दधी इसनान कराएं।
ग्रतम् ग्रतपावाम्। इस मंतर से ग्रत इसनान कराएं।
मधुवाता,
मधुनक्तम्,
मधुमान्नो।
इन तीन दुचाओं से मधुईसनान और सरकराईसनान कराएं।
इन दुग्द आधी पांच वस्तों को पंचायम्रत कहते हैं अथ्वा पाध समर्पन के
लिए कहे गए नमास्तो नेल गिरिवाय इत्यादी मंतर दुआरा पंचायम्रत से स्नान
कराएं। तद अंतर मानस्तो के हे।
इस मंतर से प्रेम पूर्वग भगवान शिव को कटी बध अर्थाद करधनी अरपित करें।
नमो ध्रिशन वे इस मंतर का उच्छारण करके
आराध्य देवुता को उत्रिय धारन कराएं।
याते हेति इत्यादी चार रिचाओं को पढ़कर
वेदग्य भकती प्रेम से विधी पूर्वग भगवान शिव
के लिए वस्त्रेवं यज्यो पवित समर्पित करें।
और इसके बाद नमहा स्वभ्याह इत्यादी मंतर को पढ़कर शुद्ध
बुध्धी वाला भकत पुरुष भगवान को प्रेम पूर्वग गंध,
सुगंधिचंडन एवं रोली चढ़ाएं।
वस्त्रे Student,
नमस्तक्षभ्यो।
इस मन्तु्र से एकशत अरपित करें।
नमहा परियायSince
इस मन्तुर से फूलचड़ाएं।
नमहा परणाएं
इस मंतु।।। развंदிे कयों करें ?
पूर्वक्त धूप दें नमा आश्वे इस रिचा से
शास्त्रोक्त विधी के अनुसार दीप निवेदन करें
तद पश्याद हात धोकर
नमों जेश्ठाय इस मंतर से उत्तम नयवध्य अरपित करें
फिर पूर्वक्त त्रियंबक मंतर से आच्चमन कराएं इमारुद्राय
इस रिचा से फल समर्पन करें फिर नमों व्रज्जाय
इस मंतर से भगवान शिव को अपना सब कुछ समर्पित कर दें
इन पूर्वक्त दो मंतरों द्वारा
केवल अक्षतों से ग्यारे रुद्र का पूजन करें
और फिर हिरन गरभ्याह इत्यादी मंतर से जो तीन रिचाओं के रूप में पठित हैं
दक्षना चढ़ावें
देवस्यत्वा इस मंतर से विद्वान पुरुष आराज्जदेव का अभिशेक करें
दीप के लिए बताय हुए नमहें आश्वे इत्यादी मंतर से भगवान शिव की निराजना
अर्थात आरती करें
तत्पश्यात
इमा रुद्राय
इत्यादी तीन रिचाओं से भक्ति पूर्वक रुद्र देव को पुष्पांजली अरपित करें
तुमानो माहान्तामाह इस मंतर से विज्य
उपासक पूजनिय देवताओं की परिक्रमा करें
फिर उठम बुद्धि वाला उपासक
माने स्तोके इस मंतर से भगवान को साश्टांग परणाम करें
एस मान्तर से सिव मुद्रा का पेरदशन करें
इस रिचा द्वारा धेनु मुद्रा दिखाएं। इस तरहें पांच
मुद्राओं का परदर्शन करके शिव सम्मंधी मुद्राओं का जप करें।
तथा वेदग्यपुरुष शत्रुद्रियह मंत्र की आवर्ती करें।
तथ पश्यात वेदग्यपुरुष पंचांग पाठ करें। तद अंतर
देवा गातु इत्यादी मंत्र से
भगवान शंकर का विसरजन करें।
इस प्रकार शिव पूजा की वैदिक विधी का विस्तार से प्रतिपादन किया गया है।
हे महरशियो,
अब संख्षेब से भी पार्थिव
पूजन की वैदिक विधी का वर्णन सुनो।
इस रिचा से
पार्थिव लिंग बनाने के लिए मिट्टी ले आए।
वाम देवाए। इत्यादी मंत्र पढ़कर
उसमें जल डालें।
जब मिट्टी संकर तयार हो जाए तब।
इस मंत्र से लिंग निर्मान करें।
देव तत्पुरुशाय। इस मंत्र से विधीवत
उसमें भगवान शिव का आवाहन करें। तद अंतर
ईशानह। मंत्र से भगवान शिव को वेदी पर इस्थापित करें। इनके सिवाई
अन्य सब विधानों को भी शुद्ध बुधी वाला उपासक संक्षेप में ही संप
गुरु के दिये हुए अन्य किसी शिव सम्मंधी मंत्र से
सोले उपचारों द्वारा
विधीवत पूजन करें। अथवा
भवाय भवनाशाय महादेवाय धीमही उग्राय उग्रणाशाय शर्वाय शशी मोलिने।
इस मंत्र द्वारा विध्वान उपासक भगवान शिव की पूजा करें।
वे भ्रम छोड़कर उत्तम भाव भक्ती से शिव की आराधना करें।
क्योंकि भगवान शिव भक्ती से ही मनुवाणचित फल देते हैं।
हे ब्रहमनों,
यहां जो वैदिक विधी से पूजन का करम बताया गया है,
इसका पूर्ण रूप से आदर करता हुआ,
मैं पूजा की एक दूसरी विधी भी बता रहा हूं,
जो उत्तम होने के साथ ही
सर्व साधारन के लिए उप्योगी है।
हे हे मुनीवरो,
पार्थिवलिंग की पूजा भगवान शिव के नामों से बनाई गई है,
वैं पूजा संपूर्ण अभिष्टों को देने वाली है,
मैं उसे बताता हूं, सुनो।
हर महिश्वर,
शंभु,
शूल पानी,
पिनाक ध्रक,
शिव पशुपती और महादेव,
ये करमशेषिव के आठ नाम कहे गए हैं,
इन में से प्रत्थम नाम के द्वारा
अर्थात ओम हरायिन नमहा
का उच्छारण करके पार्थिवलिंग बनाने के लिए पूजा भगवान शि
ये मिट्टी लाएं
दूसरे नाम अर्थात ओम महिश्वरायिन नमहा
का उच्छारण करके लिंग निर्मान करें फिर ओम शंभवेइन नमहा
बोलकर उस पार्थिवलिंग की पिर्थिष्ठा करें तद पश्यात
ओम शूल पानी ये नमहा
कहकर उस पार्थिवलिंग में भगवान शिव का आवाहन करें
ओम पिनाक ग्रशे नमहा
कहकर उस शिवलिंग को नहलाएं
ओम शिवाये नमहा
बोलकर
उसकी पूजा करें
फिर ओम पशुपतिये नमहा
कहकर ख्षमा प्रार्थना करें और अंत में ओम महादेवाये नमहा
कहकर आराद्य देव का विशरजन कर दें
प्रतेक नाम के आद में ओमकार और अंत में चतुर्थी विभक्ति के साथ नमहा
पद लगाकर बड़े आनन्द और भक्ति भाव से
पूजन सम्मंधीत सारे कारिये करने चाहीं
शडखशर मंत्र से
अंगन्यास और करन्यास के विधी भली भाती संपन्य
करके फिर नीचे लिखे हुए के अनुसार ध्यान करें
जो कैलाश परवत पर एक सुन्दर सिंगहासन के मद्य भाग में विराजमान
हैं उनके वाम भाग में भगवती ऊमा उनसे सट कर बैठी हुई हैं
सनक,
सनन्दन आदी भगत जन जिनकी पूजा कर रहे हैं तता जो भगतों के
दुख रूपी दावनल को नष्ट कर देने वाले अप्रमेव शक्ति शाली
ईश्वर हैं उन विश्व विउशन भगवान शिव का चिंतन करना चाहिए
भगवान महिश्वर का प्रति दिन इस प्रकार ध्यान करें
उनकी यंग कांती चांदी के परवत की भाती गौर है वे अपने
मस्तक पर मनोहर चंद्रमा का मुकुर्ड धारन करते हैं
रत्नों के आभूशन धारन करने से उनका श्री यंग और भी उद्भासित हो उठा है
उनके चार हाथों में क्रमश है परशु,
म्रग मुद्रा,
वर तथा अभय मुद्रा सुशोबित है
वे सदा परसंद रहते हैं,
कमल के आसन पर बैठे हैं और देवता लोग
चारों और खड़े होकर उनकी स्तुती कर रहे हैं
उन्होंने वस्त्र की जगें
व्याग्र चर्म धारन कर रखा हैं
वे इस विश्व के आदी हैं,
बीज कारणरूप हैं तथा सबका समस्त भैक हर लेने वाले हैं,
उनके पाँच मुख हैं और प्रतेख मुख मंडल में तीन तीन नेत्र हैं
इस प्रकार
ध्यान तथा उठ्तम पार्थिव लिंग का पूजन करके गुरू
के दिये हुए पंचाक्षर मंत्र का विधी पूर्वक जब करें
हे विप्रवरो विद्ध्वान पुरुष को चाहिए कि वे देविश्वर शिव को
प्रणाम करके नाना प्रकार की इस्तुतियों द्वारा उनका इस्तवन करें तथा
शत्रुद्रिय गयजुरुवेद सोलवे अध्याय के मंत्रों का पाठ करें
तत्पस्चात अञ्जली में अक्षत और फूल लेकर उत्तम भक्ति भाव से
निम्णांकित मंत्रों को पढ़ते हुए प्रेम और परसन्यता
के साथ भगवान शंकर से इस प्रकार प्रार्थना करें
सबको सुख देने वाले करपा निधान भूतनात शिव मैं आपका हूँ
आपके चर्णों में ही मेरे प्राण बसते हैं
अथ्वा आपके गुण ही मेरे प्राण हैं
मेरे जीवन सरवस्यो में मेरा चित सदा आपके ही चिंतन में लगा हुआ है
यह जान कर मुझपर प्रसन हो ये
करपा कीजिए
हे शंकर
मैंने अन्जान में अथ्वा जान भूजकर
यदी कभी आपका जप और पूजन आदी किया हो
तो आपकी करपा से वै सफल हो जाए
हे गोवरीनात
मैं आधुनिक युख का महान पापी हूँ
पतित हूँ
और आप सदा से ही परम महान पतित पावन हैं
इस बात का विचार करके
आप जैसा चाहें वैसा करें
हे महादेव
हे सदासेव
वेदों
पुराणों नाना परकार के शास्त्रिय सिध्धान्तों
और विभिन्न महरश्योंने भी अप तक आपको पूर्ण रूप से नहीं जाना है
तिर मैं हग्यानी कैसे जान सकता हूँ
हे महेश्वर
मैं जैसा हूँ
वैसा ही उसी रूप में सम्पूर्ण भाव से आपका हूँ
आपके आश्रित हूँ
इसलिए आपसे रक्षा पाने के योग्य हूँ
हे परमिश्वर
आप मुझपर प्रसन्न होईए
हे हुने
इसप्रकार प्रार्थना करके
हात में लिये हुए अक्षत और पुष्प को
भगवान शिव के उपर चढ़ाकर
उन शम्भु देव को भकती भाव से
विधी पूर्वक
साश्टांग प्रणाम करें
तद अंतर शुद्ध बुध्धी वाला उपासक
शास्त्रोप्त विधी से ईश्ट देव की परिक्रमा करें
तद उपासक शुद्ध पूर्वक स्थुतियों द्वारा
देविश्वर शिव की स्थुती करें
इसके बाद गला बचाकर
गले से अव्यक्त शब्द का उच्छारन करें
पवित्र एवं विनीत चित्वाला साधक भगवान को प्रणाम करें
इरादर पूर्वक विग्यप्ति करें और इसके बाद विसर्जन
एइ मुनीवरो
इसप्रकार विधी पूर्वक पार्थिव पूजा बताई गई है
वै भोग और मोक्ष देने वाली तथा भगवान शिव
के परती भक्ती बहाव को बढ़ाने वाली है
बोलिये शिव शंकर भगवान की जै
प्रिये भक्तो इसप्रकार यहांपर
शिशिव महा पुराण के विध्विश्व संहीता की यह कता
और उननीसमा तथा बीसमा ध्याय यहांपर समाप्त होता है
तो शद्धा के साथ बोलिये
शिव शंकर भगवान की जै आननद से बोलिये ओम नमः शिवाय
ओम नमः शिवाय
ओम नमः शिवाय
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