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Kailash Pandit
Shiv Mahapuran Rudra Sanhita Dwitiya Sati Khand Adhyay-24

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बोलिये शिवशंकर भगवान की जई!
प्रिया भक्तों,
शिवशिव महा पुरान के रुद्र सहीता..
..द्वित्य सती खंड की ये अगली कथा है.
दंड कारण्य में शिव को..
..श्रीराम के प्रती मस्तक जुकाते देख..
..सती का मोह..
..तथा शिव की आग्या से उनके द्वारा श्रीराम की परिक्षा.
तो आईए भक्तों,
आरंब करते हैं..
..इस कथा के साथ चोविश्मा अध्याय.
नारत जी बोले..
नारायन, नारायन..
हे ब्रह्मन,
हे विधे..
आपने भगवान शंकर तथा देवी सती के..
..मंगलकारी सुयश का शरवन कराया है.
अब इस समय पुनहे प्रेम पुर्वक..
..उनके उत्तम्यश का वर्णन कीजिये.
उन शिव दंपती ने वहां रहकर कौन सा चरित्र किया था?
कृपा बताएं.
ब्रह्मा जी ने कहा..
मुने,
तुम मुझसे सती और शिव के चरित्र का प्रेम से शरवन करो.
वे दोनों दंपती वहां लोकी की गती का आश्रेले..
..नित्य निरंतर क्रीडा किया करते थे.
तद अंतर,
महा देवी सती को..
..अपने पती शंकर का वियोग प्राप्त हुआ.
ऐसा कुछ शेष्ट बुद्धी वाले विद्ध्वानों का कथन है.
परन्तों मुने,
वास्तव में..
..उन दोनों का परस्पर वियोग कैसे हो सकता है?
क्योंकि वे..
..दोनों वानी और अर्थ के समान..
..एक दूसरे से सदा मिले जुले हैं.
शक्ती और भक्ति मान हैं..
..तथा
चित्त स्वरूप हैं.
फिर भी उनमें लीला विश्यक रुची होने के कारण..
..वे सब कुछ संग्ठित हो सकता है.
सती और शिव यद भी इश्वर हैं.
तो भी
लोकिक रीती का अनुसरन करके..
..वे जो जो लीलाई करते हैं..
..वे सब संभव हैं.
दक्ष कन्या सती ने जब देखा..
..कि मेरे पती ने मुझे त्याग दिया है..
..तव वे अपने पिता दक्ष के यग्य में गई..
..और वहाँ भगवान शंकर का अनादर देख..
..उन्होंने अपने शरीर को त्याग दिया.
वे ही सती पुनहे हिमाले के घर पारवती के नाम से प्रकट हुई..
..और बड़ी भारी तपस्या करके..
..उन्होंने विभा के द्वारा पुनहे भगवान शिव को प्राप्त कर लिया.
सूज़ जी कहते हैं..
..हे महरशियों,
प्रम्मा जी की ये बात सुनकर..
..नारज जी ने विधाता से..
..शिव और शिवा के महान यश के विशय में इस प्रकार पूछा.
नारज जी बोले,
नारायन, नारायन..
..हे महाभाग विश्णो शिष्ष,
विधाता हैं.
आप मुझे शिवा और शिव के भाव तथा..
..आचार से सम्मंद्यत
रखने वाले..
..अनेक चरित्रों को विस्तार पूर्वक सुनाईए.
ये तात,
बगवान चंकर ने अपने प्राणों से भी..
..प्यारी धर्मपत्मी सती का किसलिये त्याग किया?
ये घटना तो मुझे बड़ी विचित्र जान पड़ती है.
अतय है इसे आप अवश्य कहें.
अज आपके पुत्र दक्ष के यग्य में..
..भगवान शिव का अनादर कैसे हुआ?
और वहाँ पिता के यग्य में जाकर..
..सती ने अपने शरीर का त्याग किस परकार किया?
उसके बाद वहाँ क्या हुआ?
भगवान महिश्वर ने क्या किया?
ये सब बातें मुझसे कहिये.
इने सुनने के लिए मेरे मन में बड़ी शर्धा है भगवान.
ब्रह्मा जी ने कहा..
मेरे पुत्रों में शेष्ट महा प्राज्य तात नारद..
..तुम महरशीयों के साथ बड़े प्रेम से..
..भगवान चंद्र मोली का
यह चरित्त सुनो.
श्री विश्णु आधी देवताओं से सेवित..
..परब्रह्म परमिश्वर को नमस्कार करके..
..मैं उनके महान अधुद चरित्र का वर्णन आरंब करता हूँ.
हे मुने,
यह सब भगवान शिव के लीला ही है.
वे प्रभु अनेक प्रकार की लीला करने वाले..
..स्वतंत्र और निर्विकार हैं.
देवी सती भी वैसी ही हैं.
अन्यथा वैसा कर्म करने में कौन समर्थ हो सकता है?
परमिश्वर शिव ही परब्रह्म परमात्मा है.
एक समय की बात है,
तीनो लोकों में..
..विचरने वाले लीला विशारत भगवान रुद्र..
..सती के साथ बैल पर आरुढ हो इस भूतल पर भ्रमन कर रहे थे.
घूमते घूमते वे दंडकार अन्य में आये..
..वहाँ उन्होंने लक्ष्मन सहित भगवान श्रीराम को देखा..
..जो रावन द्वारा छल पूर्वक हरी गई..
..अपनी प्यारी पत्नी सीता की खोज कर रहे थे.
वे हासीते हासीते एसाउच्छ स्वर से बुकारते..
..जहां तहां देखते और बारंबार रोते थे.
उनके मन में विरह का आवेश च्छा गया था.
सूर्य वंश में उतपन वीर भूपाल,
दश्रत नंदन,
भरता ग्रज, श्रीराम..
..ानन्द रहित हो लक्ष्मन के साथ वन में भरमन कर रहे थे.
और उनकी कांती फीकी पड़ गई थी.
उस समय उदार चेता पूर्ण काल..
..भगवान शंकर ने बड़ी परसंदता के साथ उन्हें प्रणाम किया..
..और जैज़े कार करके वे दूसरी ओर चल दिये.
भगत वच्चल शंकर ने उस वन में श्रीराम के सामने अपने को प्रगट नहीं किया.
भगवान शिव की मोह में डालने वाली ऐसी लीला देख सती को बड़ा विश्मय हुआ.
वे उनकी माया से मोहित हो,
उनसे इस प्रकार बोली.
सती ने कहा,
देव,
देव सरवेश,
परब्रम, परमिश्वर,
ब्रह्मा,
विश्णू आदी सब देवता आपकी ही सदा सेवा करते हैं.
आप ही सब के द्वारा प्रणाम करने योग्य हैं.
सब को आपका ही सरवदा सेवन और ध्यान करना चाहिए.
हे नात, ये दोनों पुरुष कौन हैं?
इनकी आकृती विरहे व्यथा से व्याकुल दिखाई देती है.
ये दोनों धनुर्धर वीर वन में विचरते हुए कलेश के भागी
और दीन हो रहे हैं.
इनमें जो जेश्ठ हैं,
उनकी अंगकांती नील कमल के समान शाम है.
उसे देखकर किस कारण से आप आनन्द विभोर हो उठे थे?
हे स्वामिन,
हे कल्यान कारिशिव,
आप मेरे संशे को सुनें.
प्रभो,
सेव्य स्वामी अपने सेवकों को प्रणाम करें,
ये उचित नहीं जान पड़ता.
ब्रह्मा जी कहते हैं,
हे नारद,
कल्यान मैं परमिश्वरी आदी शक्ती सती देवी ने
शिव की माया के वशी भूत होकर जब भगवान शिव से इस परकार प्रश्ण किया,
तब सती की वे बात सुनकर,
लीला विशारत परमिश्वर शंकर
हस कर उनसे इस परकार बोले.
परमिश्वर ने कहा,
देवी,
सुनो,
मैं प्रसन्यता पूर्वक यतार्थ बात कहता हूं,
इसमें छल नहीं है,
वरदान के प्रभाव से ही मैंने इने आदर पूर्वक प्रणाम क
श्री राम और लक्ष्मन,
इनका प्राकट्य सूर्य वंश में हुआ है,
ये दोनों राजा दश्यत के विद्वान पुत्र हैं,
इनमें जो गोरे रंग के छोटे बंधु हैं,
वे साक्षात शेष के अंश हैं,
उनका नाम लक्ष्मन है,
इनके बड़े भईया का नाम श्री राम है,
इनके रूप में भगवान विश्णो ही अपने संपून अंश से प्रगट हुए हैं,
उपद्रव इनसे दूर ही रहते हैं,
ये सादु पुर्शों की रख्षा और हम लोगों के
कल्यान के लिए इस प्रत्थुई पर अवतीरन हुए हैं।
ऐसा कहकर स्ट्रश्टी करता भगवान शम्भू चुप हो गए।
शम्भू चुप हो गए।
यदि तुम्हारे मन में मेरे कथन पर विश्वास नहीं है
तो तुम वहां जाकर अपनी ही बुद्धी से श्रीराम की परिख्षा कर लो.
प्यारी सती,
जिस प्रकार तुम्हारा मोह
या ब्रहम नष्ट हो जाए
वे करो.
तुम वहां जाकर परिख्षा करो.
तब तक मैं इस बरगत के नीचे खड़ा हूँ.
ब्रहमा जी कहते हैं,
हे नारद,
भगवान शिव की आज्या से इश्वरी सती वहां गई और मनी ही मन
यह सोचने लगी कि मैं वन्चारी राम की कैसे परिख्षा करूं.
अच्छा मैं सीता का रूप धारन करके राम के पास चलूं.
यदि राम साक्षात विश्णू है तब तो सब कुछ जान लेंगे,
अन्यता वे मुझे नहीं पहचानेंगे.
ऐसा विचार सती सीता बनकर श्रीराम के समीप उनकी परिख्षा लेने के लिए गईं.
वास्तम में वे मोह में पढ़ गईं थी,
सती को सीता के रूप में सामने आया देख,
शिव शिव का जप करते हुए रहुननन श्रीराम सब कुछ
जान गए और हस्ते हुए उन्हें नमस्कार करके बोले.
श्रीराम ने पूछा,
सती जी आपको नमस्कार है,
आप प्रेम पूर्वग बताएं भगवान शंभू कहा गये हैं,
आप पती के बिना अकेली ही इस वन में क्यों कराई हैं?
हे देवी,
आपने अपना रूप त्याग कर,
किसलिए है नूतन रूप धारन किया है?
मुझ पर कृपा करके इसका कारण बताईए.
श्री राम चंद्र की ये बात सुनकर सती उस समय आश्य चकित हो गई,
वे शिव जी की कही हुई बात का इसमन करके
और उसे यथार्थ समझकर बहुत लज़ित हुई.
श्री राम को साक्षात विश्णू जान अपने रूप को प्रगट
करके मन ही मन भगवान शिव के चरणार विंदो का
चिंतन कर प्रसंज़ चित्त हुई सती उनसे इस तहें बोली,
हे रघुनन्दन,
स्वतंत्र परमिश्वर भगवान शिव
मेरे तथा अपने पार्शदों के साथ पृत्यु
पर भवन करते हुए इस वन में आ गए थे,
यहां उनोंने सीता की खोज में लगे हुए लक्ष्मन सही तुमको देखा,
उस समय सीता के लिए तुम्हारे मन में बड़ा कलेश
था और तुम विरहे शोक से पिरित दिखाई देते थे,
उस अवस्था में तुम्हे परणाम करके वे चले गए और उस वटव्रक्ष के न
प्रिक्षन के रूप में नहीं देखा तो भी तुम्हारा
दर्शन करते ही वे आनन्द विवहोर हो गए,
इस निर्मल रूप की और देखते हुए उन्हें बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ,
इस विशय में
मेरे पूछने पर भगवान शम्भू ने जो बात कही उसे सुनकर
मुझे घात हो गया है कि तुम साक्षात विश्णू हो,
तुमारी सारी प्रभुता मैंने अपनी आखों से देख ली,
अब मेरा संशेद दूर हो गया
तो भी महामते तुम मेरी बात सुनो,
मेरे सामने यह सच सच बताओ कि तुम भगवान शिव के भी वंदनिय कैसे हो गये,
मेरे मन में यही एक संदेह है,
इसे निकाल दो और शेगर ही मुझे पून्ट शान्ती परदान करो।
सती का है वचन सुनकर शीराम के नित्र प्रफुल कमल के समान खेल उठे,
उन्होंने मन ही मन अपने प्रभुभगवान शिव का स्मर्ण किया,
इससे उनके हिर्दय में प्रेम की बाढ आ गई,
हेमुने आज्या ना होने के कारण वे सती के साथ भगवान शिव के निकट न
बोलिये शिव शंकर भगवान की जै
प्रेय भक्तों इसप्रकार यहां पर
सरि शिव महा पुरान के रुद्र सहीता
द्वितिय सती खण्ड की ये कथा
और चोबिष्म आध्याई हान पर समाप्त होता है
बोलिये शिव शंकर भगवान की जै
होम्...
Om Namaha Shivaya
प्रिया भक्तों,
शिवशिव महा पुरान के रुद्र सहीता..
..द्वित्य सती खंड की ये अगली कथा है.
दंड कारण्य में शिव को..
..श्रीराम के प्रती मस्तक जुकाते देख..
..सती का मोह..
..तथा शिव की आग्या से उनके द्वारा श्रीराम की परिक्षा.
तो आईए भक्तों,
आरंब करते हैं..
..इस कथा के साथ चोविश्मा अध्याय.
नारत जी बोले..
नारायन, नारायन..
हे ब्रह्मन,
हे विधे..
आपने भगवान शंकर तथा देवी सती के..
..मंगलकारी सुयश का शरवन कराया है.
अब इस समय पुनहे प्रेम पुर्वक..
..उनके उत्तम्यश का वर्णन कीजिये.
उन शिव दंपती ने वहां रहकर कौन सा चरित्र किया था?
कृपा बताएं.
ब्रह्मा जी ने कहा..
मुने,
तुम मुझसे सती और शिव के चरित्र का प्रेम से शरवन करो.
वे दोनों दंपती वहां लोकी की गती का आश्रेले..
..नित्य निरंतर क्रीडा किया करते थे.
तद अंतर,
महा देवी सती को..
..अपने पती शंकर का वियोग प्राप्त हुआ.
ऐसा कुछ शेष्ट बुद्धी वाले विद्ध्वानों का कथन है.
परन्तों मुने,
वास्तव में..
..उन दोनों का परस्पर वियोग कैसे हो सकता है?
क्योंकि वे..
..दोनों वानी और अर्थ के समान..
..एक दूसरे से सदा मिले जुले हैं.
शक्ती और भक्ति मान हैं..
..तथा
चित्त स्वरूप हैं.
फिर भी उनमें लीला विश्यक रुची होने के कारण..
..वे सब कुछ संग्ठित हो सकता है.
सती और शिव यद भी इश्वर हैं.
तो भी
लोकिक रीती का अनुसरन करके..
..वे जो जो लीलाई करते हैं..
..वे सब संभव हैं.
दक्ष कन्या सती ने जब देखा..
..कि मेरे पती ने मुझे त्याग दिया है..
..तव वे अपने पिता दक्ष के यग्य में गई..
..और वहाँ भगवान शंकर का अनादर देख..
..उन्होंने अपने शरीर को त्याग दिया.
वे ही सती पुनहे हिमाले के घर पारवती के नाम से प्रकट हुई..
..और बड़ी भारी तपस्या करके..
..उन्होंने विभा के द्वारा पुनहे भगवान शिव को प्राप्त कर लिया.
सूज़ जी कहते हैं..
..हे महरशियों,
प्रम्मा जी की ये बात सुनकर..
..नारज जी ने विधाता से..
..शिव और शिवा के महान यश के विशय में इस प्रकार पूछा.
नारज जी बोले,
नारायन, नारायन..
..हे महाभाग विश्णो शिष्ष,
विधाता हैं.
आप मुझे शिवा और शिव के भाव तथा..
..आचार से सम्मंद्यत
रखने वाले..
..अनेक चरित्रों को विस्तार पूर्वक सुनाईए.
ये तात,
बगवान चंकर ने अपने प्राणों से भी..
..प्यारी धर्मपत्मी सती का किसलिये त्याग किया?
ये घटना तो मुझे बड़ी विचित्र जान पड़ती है.
अतय है इसे आप अवश्य कहें.
अज आपके पुत्र दक्ष के यग्य में..
..भगवान शिव का अनादर कैसे हुआ?
और वहाँ पिता के यग्य में जाकर..
..सती ने अपने शरीर का त्याग किस परकार किया?
उसके बाद वहाँ क्या हुआ?
भगवान महिश्वर ने क्या किया?
ये सब बातें मुझसे कहिये.
इने सुनने के लिए मेरे मन में बड़ी शर्धा है भगवान.
ब्रह्मा जी ने कहा..
मेरे पुत्रों में शेष्ट महा प्राज्य तात नारद..
..तुम महरशीयों के साथ बड़े प्रेम से..
..भगवान चंद्र मोली का
यह चरित्त सुनो.
श्री विश्णु आधी देवताओं से सेवित..
..परब्रह्म परमिश्वर को नमस्कार करके..
..मैं उनके महान अधुद चरित्र का वर्णन आरंब करता हूँ.
हे मुने,
यह सब भगवान शिव के लीला ही है.
वे प्रभु अनेक प्रकार की लीला करने वाले..
..स्वतंत्र और निर्विकार हैं.
देवी सती भी वैसी ही हैं.
अन्यथा वैसा कर्म करने में कौन समर्थ हो सकता है?
परमिश्वर शिव ही परब्रह्म परमात्मा है.
एक समय की बात है,
तीनो लोकों में..
..विचरने वाले लीला विशारत भगवान रुद्र..
..सती के साथ बैल पर आरुढ हो इस भूतल पर भ्रमन कर रहे थे.
घूमते घूमते वे दंडकार अन्य में आये..
..वहाँ उन्होंने लक्ष्मन सहित भगवान श्रीराम को देखा..
..जो रावन द्वारा छल पूर्वक हरी गई..
..अपनी प्यारी पत्नी सीता की खोज कर रहे थे.
वे हासीते हासीते एसाउच्छ स्वर से बुकारते..
..जहां तहां देखते और बारंबार रोते थे.
उनके मन में विरह का आवेश च्छा गया था.
सूर्य वंश में उतपन वीर भूपाल,
दश्रत नंदन,
भरता ग्रज, श्रीराम..
..ानन्द रहित हो लक्ष्मन के साथ वन में भरमन कर रहे थे.
और उनकी कांती फीकी पड़ गई थी.
उस समय उदार चेता पूर्ण काल..
..भगवान शंकर ने बड़ी परसंदता के साथ उन्हें प्रणाम किया..
..और जैज़े कार करके वे दूसरी ओर चल दिये.
भगत वच्चल शंकर ने उस वन में श्रीराम के सामने अपने को प्रगट नहीं किया.
भगवान शिव की मोह में डालने वाली ऐसी लीला देख सती को बड़ा विश्मय हुआ.
वे उनकी माया से मोहित हो,
उनसे इस प्रकार बोली.
सती ने कहा,
देव,
देव सरवेश,
परब्रम, परमिश्वर,
ब्रह्मा,
विश्णू आदी सब देवता आपकी ही सदा सेवा करते हैं.
आप ही सब के द्वारा प्रणाम करने योग्य हैं.
सब को आपका ही सरवदा सेवन और ध्यान करना चाहिए.
हे नात, ये दोनों पुरुष कौन हैं?
इनकी आकृती विरहे व्यथा से व्याकुल दिखाई देती है.
ये दोनों धनुर्धर वीर वन में विचरते हुए कलेश के भागी
और दीन हो रहे हैं.
इनमें जो जेश्ठ हैं,
उनकी अंगकांती नील कमल के समान शाम है.
उसे देखकर किस कारण से आप आनन्द विभोर हो उठे थे?
हे स्वामिन,
हे कल्यान कारिशिव,
आप मेरे संशे को सुनें.
प्रभो,
सेव्य स्वामी अपने सेवकों को प्रणाम करें,
ये उचित नहीं जान पड़ता.
ब्रह्मा जी कहते हैं,
हे नारद,
कल्यान मैं परमिश्वरी आदी शक्ती सती देवी ने
शिव की माया के वशी भूत होकर जब भगवान शिव से इस परकार प्रश्ण किया,
तब सती की वे बात सुनकर,
लीला विशारत परमिश्वर शंकर
हस कर उनसे इस परकार बोले.
परमिश्वर ने कहा,
देवी,
सुनो,
मैं प्रसन्यता पूर्वक यतार्थ बात कहता हूं,
इसमें छल नहीं है,
वरदान के प्रभाव से ही मैंने इने आदर पूर्वक प्रणाम क
श्री राम और लक्ष्मन,
इनका प्राकट्य सूर्य वंश में हुआ है,
ये दोनों राजा दश्यत के विद्वान पुत्र हैं,
इनमें जो गोरे रंग के छोटे बंधु हैं,
वे साक्षात शेष के अंश हैं,
उनका नाम लक्ष्मन है,
इनके बड़े भईया का नाम श्री राम है,
इनके रूप में भगवान विश्णो ही अपने संपून अंश से प्रगट हुए हैं,
उपद्रव इनसे दूर ही रहते हैं,
ये सादु पुर्शों की रख्षा और हम लोगों के
कल्यान के लिए इस प्रत्थुई पर अवतीरन हुए हैं।
ऐसा कहकर स्ट्रश्टी करता भगवान शम्भू चुप हो गए।
शम्भू चुप हो गए।
यदि तुम्हारे मन में मेरे कथन पर विश्वास नहीं है
तो तुम वहां जाकर अपनी ही बुद्धी से श्रीराम की परिख्षा कर लो.
प्यारी सती,
जिस प्रकार तुम्हारा मोह
या ब्रहम नष्ट हो जाए
वे करो.
तुम वहां जाकर परिख्षा करो.
तब तक मैं इस बरगत के नीचे खड़ा हूँ.
ब्रहमा जी कहते हैं,
हे नारद,
भगवान शिव की आज्या से इश्वरी सती वहां गई और मनी ही मन
यह सोचने लगी कि मैं वन्चारी राम की कैसे परिख्षा करूं.
अच्छा मैं सीता का रूप धारन करके राम के पास चलूं.
यदि राम साक्षात विश्णू है तब तो सब कुछ जान लेंगे,
अन्यता वे मुझे नहीं पहचानेंगे.
ऐसा विचार सती सीता बनकर श्रीराम के समीप उनकी परिख्षा लेने के लिए गईं.
वास्तम में वे मोह में पढ़ गईं थी,
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शिव शिव का जप करते हुए रहुननन श्रीराम सब कुछ
जान गए और हस्ते हुए उन्हें नमस्कार करके बोले.
श्रीराम ने पूछा,
सती जी आपको नमस्कार है,
आप प्रेम पूर्वग बताएं भगवान शंभू कहा गये हैं,
आप पती के बिना अकेली ही इस वन में क्यों कराई हैं?
हे देवी,
आपने अपना रूप त्याग कर,
किसलिए है नूतन रूप धारन किया है?
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वे शिव जी की कही हुई बात का इसमन करके
और उसे यथार्थ समझकर बहुत लज़ित हुई.
श्री राम को साक्षात विश्णू जान अपने रूप को प्रगट
करके मन ही मन भगवान शिव के चरणार विंदो का
चिंतन कर प्रसंज़ चित्त हुई सती उनसे इस तहें बोली,
हे रघुनन्दन,
स्वतंत्र परमिश्वर भगवान शिव
मेरे तथा अपने पार्शदों के साथ पृत्यु
पर भवन करते हुए इस वन में आ गए थे,
यहां उनोंने सीता की खोज में लगे हुए लक्ष्मन सही तुमको देखा,
उस समय सीता के लिए तुम्हारे मन में बड़ा कलेश
था और तुम विरहे शोक से पिरित दिखाई देते थे,
उस अवस्था में तुम्हे परणाम करके वे चले गए और उस वटव्रक्ष के न
प्रिक्षन के रूप में नहीं देखा तो भी तुम्हारा
दर्शन करते ही वे आनन्द विवहोर हो गए,
इस निर्मल रूप की और देखते हुए उन्हें बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ,
इस विशय में
मेरे पूछने पर भगवान शम्भू ने जो बात कही उसे सुनकर
मुझे घात हो गया है कि तुम साक्षात विश्णू हो,
तुमारी सारी प्रभुता मैंने अपनी आखों से देख ली,
अब मेरा संशेद दूर हो गया
तो भी महामते तुम मेरी बात सुनो,
मेरे सामने यह सच सच बताओ कि तुम भगवान शिव के भी वंदनिय कैसे हो गये,
मेरे मन में यही एक संदेह है,
इसे निकाल दो और शेगर ही मुझे पून्ट शान्ती परदान करो।
सती का है वचन सुनकर शीराम के नित्र प्रफुल कमल के समान खेल उठे,
उन्होंने मन ही मन अपने प्रभुभगवान शिव का स्मर्ण किया,
इससे उनके हिर्दय में प्रेम की बाढ आ गई,
हेमुने आज्या ना होने के कारण वे सती के साथ भगवान शिव के निकट न
बोलिये शिव शंकर भगवान की जै
प्रेय भक्तों इसप्रकार यहां पर
सरि शिव महा पुरान के रुद्र सहीता
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