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Kailash Pandit
Shiv Mahapuran Rudra Sanhita Tritiya Parvati Khand Adhyay-28

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बोलिये शिवशंकर भगवाने की
जए!
प्रिये भक्तों
श्री शिव महा पुरान के रुद्र सहीता
चत्ये पार्वती खंड की अगली कथा है
पार्वती जी का परमिश्वर शिव की महत्ता का प्रतिबादन करना
रोष पूर्वक जटिल ब्राह्बन को फटकारना
सखी द्वारा उन्हे फिर बोलने से रोकना
तथा भगवान शिव का उन्हे प्रतक्ष दर्शन दे अपने साथ चलने के लिए कहना
तो आईए भक्तों आरंब करते हैं ये कथा और अठाईस्मा अध्याय
सत्य कुछ नहीं है आपने कहा था कि मैं शिव को जानता हूँ
यदि आपकी ये बात ठीक होती तो आप ऐसी
युक्ति एवं बुद्धी के विरुद बात नहीं करते
नहीं बोलते
ये ठीक है कि कभी कभी महेश्वर अपने लीला शक्ती से
प्रेरित हो तथा कथित अद्भुद वेश धारन कर लिया करते हैं
परन्तु वास्तव में वे साक्षात परब्रम परमात्मा हैं
उन्होंने स्विछ्छा से ही शरीर धारन किया है
आब ब्रह्मचारी का स्वरूप धारन कर मुझे ठगने के लिए उधधत हो यहां आये हैं
और अनुचित एवं असंगत युक्तियों का
सहराले चल कपट से युक्त बाते बोल रहे हैं
मैं भगवान शंकर के स्वरूप को भली भात ही जानती हूं
इसलिए यथा योग विचार करके उनके तत्व का वढ़न करती हूं
वास्तव में शिव निर्गुण ब्रह्म हैं,
कारण वश सगुण हो गये हैं
जो निर्गुण हैं, समस्त गुण,
जिनके स्वरूप भूत हैं,
उनकी जाती कैसे हो सकती है
वे भगवान सदाशिव समस्त विध्याओं के आधार हैं,
फिर उन पूर पर्मात्मा को किसी विध्या से क्या काम?
पूर्वकाल में कल्प के आरम्ब में भगवान शम्भू ने विश्णू को
उच्छवास रूप से सम्पून वेद प्रदान किये थे.
अतेहें उनके समान उत्तम प्रभू दूसरा कौन है?
जो सबके आदी कारण हैं,
उनकी अवस्था अथ्वा आयु का माप तोल कैसे हो सकता है?
प्रकर्ती उनी से उत्पन हुई है,
फिर उनकी शक्ती का दूसरा क्या कारण हो सकता है?
उनी के अनुग्रह से विश्णू विश्णूत्व को,
ब्रह्माः ब्रह्मत्व को और दूसरा प्रश्चाक्ति
के लोग तो रखलें चेंड़ें ताने जाते हैं.
देवता देवत्तु को प्राप्त हुए हैं
शिव जी का पक्ष लेकर बहुत बोलने से क्या लाब
वे भगवान स्वेम ही महपरभू हैं
कल्यान रूपी शिव की सेवा से यहां कौन सा मनुरत सिद्ध नहीं हो सकता
उन ब्रह्मा जी के पास किस बात की कमी है
जो वे भगवान सदाशिव स्वेम मुझे पाने की च्छा करें
यदि शंकर जी की सेवा नहीं करें तो मनुष्य साथ जन्मों तक दरिद्र होता है
और उनी की सेवा से सेवक को लोक में कभी
नष्ट नहीं होने वाली लख्षमी प्राप्त होती है
जिसके सामने आठो सिद्धिया नित्य आकर सिर जुकाकर
नीचा किये इस इच्छा से नित्य करती हैं
कि वे भगवान हम पर संतुष्ट हो जायें
उनके लिए कोई भी हित कर वस्तु दुरलब कैसे हो सकती है
यद्यपी यहां मांगलिक कही जाने वाली वस्तुएं शंकर का सेवन नहीं करती
तधापी उनके इस्मर्ण मात्र से ही सबका मंगल हो जाता है
परन्तु यदी उनका
दगाया हुआ भस्म अपवित्र होता तो उनके शरीर से जढड कर गिरे
हुए उन भस्म को देवता लोग सदा अपने सिर पर कैसे धारन करते?
अतय शिव के अंगों के सपर्श से अपवित्र वस्तो भी पवित्र हो जाती है.
जो महा देव सगुण होकर तीनों लोकों के कर्ता,
भर्ता और हर्ता होते हैं तत्था निर्गुन लूप में शिव कहलाते हैं,
वे बुद्धी के द्वारा पून लूप से कैसे जाने जा सकते हैं?
पर ब्रह्म,
परमात्मा शिव का जो निर्गुन लूप है,
उसे आप जैसे बहिरमुख लोग कैसे जान सकते हैं?
जो दुराचारी और पापी हैं,
वे देवताओं से भहिस्कृत हो जाते हैं,
ऐसे लोग निर्गुन शिव के तत्व को नहीं जानते हैं.
जो पुरुष तत्व को नहीं जानने के कारण यहां शिव के निन्दा करता है,
उसके जन्म भर का सारा संचित पुन्य भस्म हो जाता है.
आपने जो यहां अमित तेज़स्री महादेव जी की
निन्दा की है और मैंने जो आपकी पूजा की है,
उससे मुझे पाप की भागनी होना पड़ा है.
शिव द्रोही को देख कर वस्तर सहीत स्नान करना चाहिए,
शिव द्रोही का दर्शन हो जाने पर प्राश्चित करना चाहिए.
इतना कहकर पारवती जी उस ब्राह्मन पर अधिक रुष्ट होकर बोली,
अरे रे दुष्ट,
तूने कहा था कि मैं शंकर को जानता हूँ,
परन्तु निष्चे ही तूने उन सनातन शिव को नहीं जाना है.
बगवान रुद्र को तू जैसा कहता है,
वे वैसे ही क्यों न हो,
उनके जैसे भी बहु संक्षक रूप क्यों न हो,
सद्पुर्शों के प्रियतम नित्य निर्विकार
वे भगवान शिव ही मेरे अभिष्टतम देव हैं.
ब्रह्मा और विश्णू भी कभी उन महत्मा हर के स
भगवान शिव के लिए वन में आकर बड़ी भारी तपस्या कर रहीं.
वे भक्त वच्चल सर्विश्वर शिव ही हम सबके परमिश्वर हैं.
दीनों पर अनुग्रह करने वाले उन महादेव
को ही प्राप्त करने की मेरी इच्छा है.
ब्रह्मा जी कहते हैं,
हे नारद,
ऐसा कहकर गिर्राज नन्डनी गिर्जा चुप हो गईं और
निर्विकार चित से भगवान शिव का ध्यान करने लगी.
देवी की बात सुनकर वे ब्रह्मचारी,
ब्राह्मण जो ही कुछ फिर कहने के लिए उधधत हुआ,
तो ही शिव में आसक्त चित होने के कारण उनकी निन्दा सुनने
से विमुख हुई पारवती अपनी सखी विजिया से शीगर बोली.
पारवती जी ने कहा,
सखी इस उदम ब्राह्मण को
यत्न पूर्वक रोको,
यह फिर कुछ कहना चाहता है,
यह केवल शिव की निनदा ही करेगा,
जो शिव की निनदा करता है,
केवल उसी को पाप नहीं लगता,
जो उस निनदा को सुनता है,
वेह भी यहां पाप का भागी हो
भगवान शिव के उपासकों को चाहिए,
कि वेशिव की निनदा करने वाले का सरवता वद करें,
यदि वे ब्राह्मण हो तो उसे अवश्य ही त्याग दें,
और सुवें उस निनदा के स्थान से शिगर दूर चले जाएं,
यह दुष्ट ब्राह्मण फिर शिव की निनदा करेगा,
ब्राह्मण होने के कारण यह वद तो है नहीं,
अतर त्याग देने योग है,
किसी तरहें भी इसका मुह नहीं देखना चाहिए,
इस इस्तान को छोड़कर हम लोग आज ही किसी
दूसरे इस्तान में शिगर ही चली चलें,
जिससे फिर इस अग्यानी के साथ बात करने का उस्तर नहीं मिले,
ब्रह्मा जी कहते हैं,
हे नारद,
ऐसा कहकर उमाने जो ही
अन्यत्र जाने के लिए पेर उठाया,
त्यों ही भगवान शिव ने अपने साक्षात स्रूप
से प्रकथ हो प्रिया पारवती का हाथ पकड़ लिया,
शिवा जैसे स्रूप का ध्यान करती थी,
वैसा ही स्रूप,
रूप धारन करके शिव ने उन्हें दर्शन दिये,
पारवती ने लजजावश अपना मुँ नीचे की ओर कर लिया,
तब भगवान शिव उनसे बोले,
हे प्रिये मुझे चोड़ कर कहां जाओगी,
अब मैं फिर कभी तुम्हारा त्याग नहीं करूँगा,
मैं प्रसन हूँ बर मांगो,
मुझे तुम्हारे लिए कुछ भी अदे नहीं है,
हे देवी,
आज से मैं तपस्चा के मोल खरीदा हुआ तुम्हारा दास हूँ,
तुम्हारे सॉन्द्रिय ने भी मुझे मोह लिया है,
अब तुम्हारे बिना मुझे एक खण भी युग के समान जान पड़ता है,
लजजा छोड़ो,
तुम तो मेरी सनातन पत्नी हूँ,
गिरिराज नन्दनी,
हे महिश्वरी,
मैंने जो कुछ कहा है उस पर शेष्ट बुद्धी से विचार करो,
सोईस्थिर चित्वाली पारवती,
मैंने नाना परकार से तुम्हारी बारंबार परिक्षा ली है,
लोक लीला का अनुसरन करने वाले मुझ स्वयजन के अपराद को क्षमा कर दो,
हे शिवे,
तीनों लोकों में तुम्हारी जैसी अनुरागनी,
मुझे दूसरी कोई नहीं दिखाई देती,
मैं सर्वता तुम्हारे अधीन हूँ,
तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो,
हे प्रिये मेरे पास आओ,
तुम मेरी पत्नी हो और मैं तुम्हारा वर हूँ,
तुम्हारे साथ मैं शेगर ही अपने निवास
इस थान उत्तम परवत केलास को चलूँगा,
ब्रह्मा जी कहते हैं,
देवादि देव महादेव जी के ऐसा कहने पर पार्वती देवी आनन्द मगन हो उठी,
उनका तपस्या जनित पहले का सारा कश्ट मिट गया,
हे मनि शेष्ट,
सती साधवी पारवती की सारी ठकावट दूर हो गई,
क्योंकि परिश्रम फल प्राप्त हो जाने पर प्राणी
का पहले वाला सारा श्रम नष्ट हो जाता है,
बोलिये शिवशंकर भगवान की जै!
प्रिये भक्तों,
इस प्रकार यहां पर
स्रिशिव महा पुरान के रुद्र सहीता
तृत्ये पारवती कंड की ये कथा
और 28 मा अध्याय यहां पर समाप्त होता है,
बोलिये शिवशंकर भगवान की जै!
ओम् नमहां शिवाय,
ओम् नमहां शिवाय
जए!
प्रिये भक्तों
श्री शिव महा पुरान के रुद्र सहीता
चत्ये पार्वती खंड की अगली कथा है
पार्वती जी का परमिश्वर शिव की महत्ता का प्रतिबादन करना
रोष पूर्वक जटिल ब्राह्बन को फटकारना
सखी द्वारा उन्हे फिर बोलने से रोकना
तथा भगवान शिव का उन्हे प्रतक्ष दर्शन दे अपने साथ चलने के लिए कहना
तो आईए भक्तों आरंब करते हैं ये कथा और अठाईस्मा अध्याय
सत्य कुछ नहीं है आपने कहा था कि मैं शिव को जानता हूँ
यदि आपकी ये बात ठीक होती तो आप ऐसी
युक्ति एवं बुद्धी के विरुद बात नहीं करते
नहीं बोलते
ये ठीक है कि कभी कभी महेश्वर अपने लीला शक्ती से
प्रेरित हो तथा कथित अद्भुद वेश धारन कर लिया करते हैं
परन्तु वास्तव में वे साक्षात परब्रम परमात्मा हैं
उन्होंने स्विछ्छा से ही शरीर धारन किया है
आब ब्रह्मचारी का स्वरूप धारन कर मुझे ठगने के लिए उधधत हो यहां आये हैं
और अनुचित एवं असंगत युक्तियों का
सहराले चल कपट से युक्त बाते बोल रहे हैं
मैं भगवान शंकर के स्वरूप को भली भात ही जानती हूं
इसलिए यथा योग विचार करके उनके तत्व का वढ़न करती हूं
वास्तव में शिव निर्गुण ब्रह्म हैं,
कारण वश सगुण हो गये हैं
जो निर्गुण हैं, समस्त गुण,
जिनके स्वरूप भूत हैं,
उनकी जाती कैसे हो सकती है
वे भगवान सदाशिव समस्त विध्याओं के आधार हैं,
फिर उन पूर पर्मात्मा को किसी विध्या से क्या काम?
पूर्वकाल में कल्प के आरम्ब में भगवान शम्भू ने विश्णू को
उच्छवास रूप से सम्पून वेद प्रदान किये थे.
अतेहें उनके समान उत्तम प्रभू दूसरा कौन है?
जो सबके आदी कारण हैं,
उनकी अवस्था अथ्वा आयु का माप तोल कैसे हो सकता है?
प्रकर्ती उनी से उत्पन हुई है,
फिर उनकी शक्ती का दूसरा क्या कारण हो सकता है?
उनी के अनुग्रह से विश्णू विश्णूत्व को,
ब्रह्माः ब्रह्मत्व को और दूसरा प्रश्चाक्ति
के लोग तो रखलें चेंड़ें ताने जाते हैं.
देवता देवत्तु को प्राप्त हुए हैं
शिव जी का पक्ष लेकर बहुत बोलने से क्या लाब
वे भगवान स्वेम ही महपरभू हैं
कल्यान रूपी शिव की सेवा से यहां कौन सा मनुरत सिद्ध नहीं हो सकता
उन ब्रह्मा जी के पास किस बात की कमी है
जो वे भगवान सदाशिव स्वेम मुझे पाने की च्छा करें
यदि शंकर जी की सेवा नहीं करें तो मनुष्य साथ जन्मों तक दरिद्र होता है
और उनी की सेवा से सेवक को लोक में कभी
नष्ट नहीं होने वाली लख्षमी प्राप्त होती है
जिसके सामने आठो सिद्धिया नित्य आकर सिर जुकाकर
नीचा किये इस इच्छा से नित्य करती हैं
कि वे भगवान हम पर संतुष्ट हो जायें
उनके लिए कोई भी हित कर वस्तु दुरलब कैसे हो सकती है
यद्यपी यहां मांगलिक कही जाने वाली वस्तुएं शंकर का सेवन नहीं करती
तधापी उनके इस्मर्ण मात्र से ही सबका मंगल हो जाता है
परन्तु यदी उनका
दगाया हुआ भस्म अपवित्र होता तो उनके शरीर से जढड कर गिरे
हुए उन भस्म को देवता लोग सदा अपने सिर पर कैसे धारन करते?
अतय शिव के अंगों के सपर्श से अपवित्र वस्तो भी पवित्र हो जाती है.
जो महा देव सगुण होकर तीनों लोकों के कर्ता,
भर्ता और हर्ता होते हैं तत्था निर्गुन लूप में शिव कहलाते हैं,
वे बुद्धी के द्वारा पून लूप से कैसे जाने जा सकते हैं?
पर ब्रह्म,
परमात्मा शिव का जो निर्गुन लूप है,
उसे आप जैसे बहिरमुख लोग कैसे जान सकते हैं?
जो दुराचारी और पापी हैं,
वे देवताओं से भहिस्कृत हो जाते हैं,
ऐसे लोग निर्गुन शिव के तत्व को नहीं जानते हैं.
जो पुरुष तत्व को नहीं जानने के कारण यहां शिव के निन्दा करता है,
उसके जन्म भर का सारा संचित पुन्य भस्म हो जाता है.
आपने जो यहां अमित तेज़स्री महादेव जी की
निन्दा की है और मैंने जो आपकी पूजा की है,
उससे मुझे पाप की भागनी होना पड़ा है.
शिव द्रोही को देख कर वस्तर सहीत स्नान करना चाहिए,
शिव द्रोही का दर्शन हो जाने पर प्राश्चित करना चाहिए.
इतना कहकर पारवती जी उस ब्राह्मन पर अधिक रुष्ट होकर बोली,
अरे रे दुष्ट,
तूने कहा था कि मैं शंकर को जानता हूँ,
परन्तु निष्चे ही तूने उन सनातन शिव को नहीं जाना है.
बगवान रुद्र को तू जैसा कहता है,
वे वैसे ही क्यों न हो,
उनके जैसे भी बहु संक्षक रूप क्यों न हो,
सद्पुर्शों के प्रियतम नित्य निर्विकार
वे भगवान शिव ही मेरे अभिष्टतम देव हैं.
ब्रह्मा और विश्णू भी कभी उन महत्मा हर के स
भगवान शिव के लिए वन में आकर बड़ी भारी तपस्या कर रहीं.
वे भक्त वच्चल सर्विश्वर शिव ही हम सबके परमिश्वर हैं.
दीनों पर अनुग्रह करने वाले उन महादेव
को ही प्राप्त करने की मेरी इच्छा है.
ब्रह्मा जी कहते हैं,
हे नारद,
ऐसा कहकर गिर्राज नन्डनी गिर्जा चुप हो गईं और
निर्विकार चित से भगवान शिव का ध्यान करने लगी.
देवी की बात सुनकर वे ब्रह्मचारी,
ब्राह्मण जो ही कुछ फिर कहने के लिए उधधत हुआ,
तो ही शिव में आसक्त चित होने के कारण उनकी निन्दा सुनने
से विमुख हुई पारवती अपनी सखी विजिया से शीगर बोली.
पारवती जी ने कहा,
सखी इस उदम ब्राह्मण को
यत्न पूर्वक रोको,
यह फिर कुछ कहना चाहता है,
यह केवल शिव की निनदा ही करेगा,
जो शिव की निनदा करता है,
केवल उसी को पाप नहीं लगता,
जो उस निनदा को सुनता है,
वेह भी यहां पाप का भागी हो
भगवान शिव के उपासकों को चाहिए,
कि वेशिव की निनदा करने वाले का सरवता वद करें,
यदि वे ब्राह्मण हो तो उसे अवश्य ही त्याग दें,
और सुवें उस निनदा के स्थान से शिगर दूर चले जाएं,
यह दुष्ट ब्राह्मण फिर शिव की निनदा करेगा,
ब्राह्मण होने के कारण यह वद तो है नहीं,
अतर त्याग देने योग है,
किसी तरहें भी इसका मुह नहीं देखना चाहिए,
इस इस्तान को छोड़कर हम लोग आज ही किसी
दूसरे इस्तान में शिगर ही चली चलें,
जिससे फिर इस अग्यानी के साथ बात करने का उस्तर नहीं मिले,
ब्रह्मा जी कहते हैं,
हे नारद,
ऐसा कहकर उमाने जो ही
अन्यत्र जाने के लिए पेर उठाया,
त्यों ही भगवान शिव ने अपने साक्षात स्रूप
से प्रकथ हो प्रिया पारवती का हाथ पकड़ लिया,
शिवा जैसे स्रूप का ध्यान करती थी,
वैसा ही स्रूप,
रूप धारन करके शिव ने उन्हें दर्शन दिये,
पारवती ने लजजावश अपना मुँ नीचे की ओर कर लिया,
तब भगवान शिव उनसे बोले,
हे प्रिये मुझे चोड़ कर कहां जाओगी,
अब मैं फिर कभी तुम्हारा त्याग नहीं करूँगा,
मैं प्रसन हूँ बर मांगो,
मुझे तुम्हारे लिए कुछ भी अदे नहीं है,
हे देवी,
आज से मैं तपस्चा के मोल खरीदा हुआ तुम्हारा दास हूँ,
तुम्हारे सॉन्द्रिय ने भी मुझे मोह लिया है,
अब तुम्हारे बिना मुझे एक खण भी युग के समान जान पड़ता है,
लजजा छोड़ो,
तुम तो मेरी सनातन पत्नी हूँ,
गिरिराज नन्दनी,
हे महिश्वरी,
मैंने जो कुछ कहा है उस पर शेष्ट बुद्धी से विचार करो,
सोईस्थिर चित्वाली पारवती,
मैंने नाना परकार से तुम्हारी बारंबार परिक्षा ली है,
लोक लीला का अनुसरन करने वाले मुझ स्वयजन के अपराद को क्षमा कर दो,
हे शिवे,
तीनों लोकों में तुम्हारी जैसी अनुरागनी,
मुझे दूसरी कोई नहीं दिखाई देती,
मैं सर्वता तुम्हारे अधीन हूँ,
तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो,
हे प्रिये मेरे पास आओ,
तुम मेरी पत्नी हो और मैं तुम्हारा वर हूँ,
तुम्हारे साथ मैं शेगर ही अपने निवास
इस थान उत्तम परवत केलास को चलूँगा,
ब्रह्मा जी कहते हैं,
देवादि देव महादेव जी के ऐसा कहने पर पार्वती देवी आनन्द मगन हो उठी,
उनका तपस्या जनित पहले का सारा कश्ट मिट गया,
हे मनि शेष्ट,
सती साधवी पारवती की सारी ठकावट दूर हो गई,
क्योंकि परिश्रम फल प्राप्त हो जाने पर प्राणी
का पहले वाला सारा श्रम नष्ट हो जाता है,
बोलिये शिवशंकर भगवान की जै!
प्रिये भक्तों,
इस प्रकार यहां पर
स्रिशिव महा पुरान के रुद्र सहीता
तृत्ये पारवती कंड की ये कथा
और 28 मा अध्याय यहां पर समाप्त होता है,
बोलिये शिवशंकर भगवान की जै!
ओम् नमहां शिवाय,
ओम् नमहां शिवाय
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