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Dilbar Meraj
Azan Ki Azmat

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बनदगी रबू की करोगे तो खुशी पाओगे
अजाजे से ही
जा करके नमाजे पढ़ना
सामेइन हजराद
शरीक एसिट इसलमिक और संजिया गर्वाल जी पेश कर रहे हैं
एक और बहत्रीन वाकया जिसका उन्वान है अजान की अजमत और तवायप का नाच
जिसे गाया है दिल्बर मेराज साबरी दूगो बदायूनी ने
और इसे लिखा है फैस बदायूनी साहब ने इसका म्यूजिक दिया है
आली जनाब राजू खान साहब ने रिगार्डिंग गुलाम साबरी साहब ने की है
और सलाकार है मुसरत अली जी आए सामेइन मुलहिसा करें
ये भी बड़ा हसीन वाकया आजान की अजमत और तवायफ का नाच
भूल कर जो शरीत को जिंदगी बिताएंगे
वो मुसल्म दोजख में अपना घर बनाएंगे
भूल कर जो शरीत को जिंदगी बिताएंगे
वो मुसल्म दोजख में अपना घर बनाएंगे
वो मुसल्म दोजख में अपना घर बनाएंगे
तास्तान इबुरत की फैज एक सुनाते हैं
क्या आजान की अजमत ये तुम्हें बताते हैं
यूपी के शहर लोनी की सुनो कहानी हैं
ये अजाब कुदुरत की लोगो सच बयानी हैं
इस शहर में ही रहता एक मुसल्म ऐसा था
दीन मुस्तफाई पर अपनी जान लुटाता था
नाम उसका सादिक था वो बड़ा नमाजी था
उसके नेक कामों से रभ ही उससे राजी था
उसकी एक बीबी थी नाम उसका सलमा था
उसके प्यारे होटों पर भी नबी का कलमा था
दीन दार औरत थी वो नमाज पढ़ती थी साथ रहती शोहर के वो कभी न लड़ती थी
उसका प्यारा शोहर भी उससे प्यार करता था चाहता उसे बेहद जान सार करता था
जो आजान सुन के ना मस्जदों में जाएंगे
वो मुसल्मा दोदख में अपना घर बनाएं्गे
कोह, मुसल्मा दौधख में अपना घर बनाएंगे
रब ने दो दिये पेटे आँख के वो तारे थे
हो रहे थे सादिख ते बाखुशी गुजारे थे
काम था सिलाई का उसका कारखाना था
रोज ही तो सादिख का दिल्ली आना जाना था
उसके खूब पैसा था उसके खूब दौलत थी
शहर भर के लोगों में उसकी खूब इजद थी
जब जवा हुए बेटे आ रहे थे रिष्टे थे
सारी ही विरादर में उसके खूब चर्चे थे
जो थे बेटे सादिख के वो अकड में रहते थे
बाप मा की बातों को वो ना दोनों सुनते थे
दोस्तों के संग फिरते अपने मन की करते थे
थे बड़े निधर दोनों ना किसी से डरते थे
रोज ही उन्हें सादिख ये ही बात बतलाता
काम पर लगाओ दिल उनको रोज समझाता
वालिदेन का अपने जो भी दिल दुखाएंगे
वालिदेन का अपने जो भी दिल दुखाएंगे
वो मुसल्म दो जख में अपना घर बनाएंगे
सामेइन हजराद अभी आप सुनने हैं वाकया आजान की अजमत और तमयफ का नाथ
सामेइन दिल्ली के बिल्कुल करीम में ही एक लोनी जो
जगा है ये वहाँ का सच्चा वाकया मैं आपको सुना रहा हूँ
जो सादिक नाम के एक शक्स हैं जो बड़े ही परेजगार नमाजी थे
उनके दो बेटे हैं लेकिन आगे जो बहुती नाफर्मान हैं आगे इस
वाके में इन दोनों नाफर्मान बेटों का क्या होगा समार्थ करें
बेटे दोनों सादिक के मस्तियां किया करते बाप उमा की
बातों पर घौर ना दिया करते काम पर भी जाते थे नोट
भी कमाते थे पर वो दोनों यारी में पैसे को उडाते थे
बढ़ गई चो दोनों की हद से ज्यादा मनमानी
अब तो दोनों बेटों की शादी करने की ठानी
एक दिन हुआ ऐसा एक आए मुल्ला जी बेटे देख सादिक के हो गए थे वो राजी
उनके बेटिया दो थी दोनों खूब सूरत थी
दोनों आलमा थी वो दोनों खूब सीरत थी
जो लिखा है किसमत में वो तो होके रहता
है वक्त पर किसी का ना कोई जोर चलता है
रिष्टे हो गए पक्के हो गई सगाई भी रस्म जो चलानी थी सबने वो चलाई भी
जोनभी की सुननत् को दिल से ना निभाएंगे
अपने खर बनाएगे
वो मुसल्म दोज़ अपने
अपना खर बनाएगे
हम
अपने दोनों लड़कों की हर्कतों से बाज आकर अब इनकी शादी की ठान लेते हैं
और एक दिन ऐसा होता है कि सादिक साहब
के यहां पर एक मुल्ला जी तश्रीफ लाते है
जो दोनों लड़कों को देखकर पसंद भी कर
लेते हैं क्योंकि उनके दो बेटिया थी
जो आलिमा थी और बहुती खुपसूरत थी और दोनों
तरफ से शादी की तैयारिया खूब चल रही हैं
आगे क्या होता है समाद करें
घर में आई खुशिया थी सारा घर मगन रहता
घंठा दिल में सादिक थे पर वो कुछ नहीं कहता
रख गई थी शादी की दोनों की ही तारीखें
हो गई इखटी भी शादी की सब ही चीजें
शादी में नए चोड़े सब ने ही बनाए थे
दूले खुपसूरत सी शेरवानी लाए थे
घर में आ गए
मेहमा हो गई थी हलचल सी
भीनी भीनी फैली थी खुशबू आज संदल सी
दुलहनों को लाने की खूब अब तयारी थी
जानी दोनों लड़कों की थी बरात भारी थी
दोस्त बोले लड़कों से कुछ मजा न पाओगे जब तलग न शादी में रंडिया न चाओगे
बन गए थे मनसूबे अब तो आखो आखो में रंडिया गए लेने दिल्ली बातो बातो में
जो भी जश्न शादी में रंडिया न चाओगे
वो मुसल्म दोजख में अपना घर बनाएंगे
वो मुसल्म दोजख में अपना घर बनाएंगे
देखिये हजराद
शादी की तैयारियां दोनों तरफ खूब चल लही हैं
और दोनों ही घरों में
खुशिया हैं
और दोनों तरफ मेमान तश्रीब ला चुके हैं
लड़के रंडईया लाये रात भर नचायी थी
खूग अपनी शादी में खुशिया इउं मनाई थी
वक्त जब फजर का था
हो रही अजाने थी
मस्जदों में लोगों को अब नमाजे पढ़नी थी
सुनते ही अजान
रंडी नाचने से बाद आई
तब वो दोनों लड़कों ने रंडियात ही हड़काई
बोले थे अजान दिन में पांच बार होती है
शादी जिन्दगानी में एक बार होती है
हो रही अजान है तो तुम अजान होने तो
नाचती रहो यूही तुम ना पैरों को रोको
रंडिया बुझे मन से फिर थिरकनी लगती है
लड़कों के वो कहने पर नाचने वो लगती है
थी नमाज पढ़नी वो
दूबे सारे मस्ती में
खूबु हल्लगुला खा उस घड़ी तो बस्ती में
दीने मुस्तफाई से जो नजर चुराएंगे
वो मुसल्म दो जख में अपना घर बनाएंगे
देखिये सामेइन
वो लड़के जाकर
नाचने वालियों को लियाते हैं और रात भर नाच होता है जब वक्ते फजर
होता है तो जो नाचने वाली थी उनके कान में आजान की आवाज जाती है और
वो अपने पैरो को रोक लेती हैं क्योंकि उन्हें भी अल्ला का खौफ था
वक्ते फजर है और मस्जितों से आजान की आवाज आ रही है
सब लोग नमास पढ़ेंगे तो वो लड़के कहते हैं
कि ये आजान को दिन में पांच मरतबा होती है
ये शादी एकी मरतबा होगी और तुम रोज-रोज नहीं आओगी चलिये नाचिये
वो डराते हैं और धंकाते भी हैं वो नाचने
वाली डर से फिर नाचना शुरू कर देती हैं
लेकिन आगे इनका अंजाम क्या होगा समाथ करें
हो गई सुबा थी जब रंडिया चली दिल्ली
पीछे दोनों लड़कों की गाडिया चली दिल्ली
दिन के बज़ गए थे नौ
हो गया सवेरा था था बड़ा घना कोहरा
लग रहा अंधेरा सा
आगे आगे चलती थी रंडियों की गाड़ी थी
पीछे दोनों लड़कों की चल रही सवारी थी
आ
रहा टिरक था एक
खूब अपनी मस्ती में उसने मार दी टकर लड़कों की थी गाड़ी में
जो हुई थी ये टकर
थी बड़ी
भयानक सी बन गया कुछ उमर था
कुछ बचा ना था बाकी
वो जो दोनों लड़के थे दूला बनने वाले थे
हो गए अचानक वो मौत के हवाले थे
लाशे थी पड़ी दोनों हिलती थी ना डूलती थी
था जिनहें गुमा खुद पर मक्हियां भिनकती थी
राहे हक पे चल करके जो नहीं दिखाएंगे
वो मुसल्म दो जख में अपना घर बनाएंगे
वो मुसल्म दो जख में अपना घर बनाएंगे
जो वो नाचने वाली थी उने ही भी अल्ला का खोप था और वो अल्ला से डरती थी
और अपना पेट पालने के लिए अपने बच्चे पालने के लिए नाचा करती थी
अब सुबा हो जाती है और दिन के 9 बच जाते हैं तो
वो लड़के उन नाचने वालीं को दिली छोड़ने जाते हैं
रास्ते में बड़ा कोरा था अचानक ट्रक से
टक्कर हो जाती है और उनकी मौत हो जाती है
सामेइन देखिये आपने सुना कि अजान की बेहुरमती करने
की इने क्या सजा मिली है और मौत का कुछ नहीं पता
किस वक्त आ जाए और कब हमें अल्ला अपने पास बुला ले
किसी ने कहा है आगाहा अपनी मौत से कोई बशर
नहीं सामान सौ बरस का है पलकी खबर नहीं
अल्ला से डरना चाहिए और उसका नाम लेना चाहिए और अजान का
एहत्राम करना चाहिए और नमास पढ़ना चाहिए आईए सामेइन आखरी
बंद में फैज बदाईमनी सहाब क्या कह रहे हैं समाद करें
लाशे हॉस्पीटल से जब वो दोनों घर आई घर की औरते सारी खूब रोई चिलाई
बापुमाने मुश्किल से अपना दिल समहाला था
उनकी थी पड़ी लाशे जिनको दिल से पाला था
दिल की हस्रतों पे अब गिर पड़ी थी ये बिजली
मर गए सबही अर्माँ ना हुई खुशी पूरी
जिनकी आज शादी थी उठ रहे जनाजे थे
बदनसीबी थी इनकी ये बड़े अभागे थे
जो आजान की दोनों बे घुर्मती नहीं करते
तो आजाब खुदुरत से दोनों ही बचे रहते
चाहे कितनी दौलत हो
तुम घुरूर मत करना रब की बंदगी करना रब से तुम सदा डरना
वरना जिन्दगानी रब खाक में मिला देगा
रूह काप जाएगी ऐसी वो सदा देगा
फैज जो किसी को भी हर घड़ी सताएंगे
वो मुसल्म दोजख में अपना घड़ बनाएंगे
वो मुसल्म दोजख में अपना घड़ बनाएंगे
अजाजे से ही
जा करके नमाजे पढ़ना
सामेइन हजराद
शरीक एसिट इसलमिक और संजिया गर्वाल जी पेश कर रहे हैं
एक और बहत्रीन वाकया जिसका उन्वान है अजान की अजमत और तवायप का नाच
जिसे गाया है दिल्बर मेराज साबरी दूगो बदायूनी ने
और इसे लिखा है फैस बदायूनी साहब ने इसका म्यूजिक दिया है
आली जनाब राजू खान साहब ने रिगार्डिंग गुलाम साबरी साहब ने की है
और सलाकार है मुसरत अली जी आए सामेइन मुलहिसा करें
ये भी बड़ा हसीन वाकया आजान की अजमत और तवायफ का नाच
भूल कर जो शरीत को जिंदगी बिताएंगे
वो मुसल्म दोजख में अपना घर बनाएंगे
भूल कर जो शरीत को जिंदगी बिताएंगे
वो मुसल्म दोजख में अपना घर बनाएंगे
वो मुसल्म दोजख में अपना घर बनाएंगे
तास्तान इबुरत की फैज एक सुनाते हैं
क्या आजान की अजमत ये तुम्हें बताते हैं
यूपी के शहर लोनी की सुनो कहानी हैं
ये अजाब कुदुरत की लोगो सच बयानी हैं
इस शहर में ही रहता एक मुसल्म ऐसा था
दीन मुस्तफाई पर अपनी जान लुटाता था
नाम उसका सादिक था वो बड़ा नमाजी था
उसके नेक कामों से रभ ही उससे राजी था
उसकी एक बीबी थी नाम उसका सलमा था
उसके प्यारे होटों पर भी नबी का कलमा था
दीन दार औरत थी वो नमाज पढ़ती थी साथ रहती शोहर के वो कभी न लड़ती थी
उसका प्यारा शोहर भी उससे प्यार करता था चाहता उसे बेहद जान सार करता था
जो आजान सुन के ना मस्जदों में जाएंगे
वो मुसल्मा दोदख में अपना घर बनाएं्गे
कोह, मुसल्मा दौधख में अपना घर बनाएंगे
रब ने दो दिये पेटे आँख के वो तारे थे
हो रहे थे सादिख ते बाखुशी गुजारे थे
काम था सिलाई का उसका कारखाना था
रोज ही तो सादिख का दिल्ली आना जाना था
उसके खूब पैसा था उसके खूब दौलत थी
शहर भर के लोगों में उसकी खूब इजद थी
जब जवा हुए बेटे आ रहे थे रिष्टे थे
सारी ही विरादर में उसके खूब चर्चे थे
जो थे बेटे सादिख के वो अकड में रहते थे
बाप मा की बातों को वो ना दोनों सुनते थे
दोस्तों के संग फिरते अपने मन की करते थे
थे बड़े निधर दोनों ना किसी से डरते थे
रोज ही उन्हें सादिख ये ही बात बतलाता
काम पर लगाओ दिल उनको रोज समझाता
वालिदेन का अपने जो भी दिल दुखाएंगे
वालिदेन का अपने जो भी दिल दुखाएंगे
वो मुसल्म दो जख में अपना घर बनाएंगे
सामेइन हजराद अभी आप सुनने हैं वाकया आजान की अजमत और तमयफ का नाथ
सामेइन दिल्ली के बिल्कुल करीम में ही एक लोनी जो
जगा है ये वहाँ का सच्चा वाकया मैं आपको सुना रहा हूँ
जो सादिक नाम के एक शक्स हैं जो बड़े ही परेजगार नमाजी थे
उनके दो बेटे हैं लेकिन आगे जो बहुती नाफर्मान हैं आगे इस
वाके में इन दोनों नाफर्मान बेटों का क्या होगा समार्थ करें
बेटे दोनों सादिक के मस्तियां किया करते बाप उमा की
बातों पर घौर ना दिया करते काम पर भी जाते थे नोट
भी कमाते थे पर वो दोनों यारी में पैसे को उडाते थे
बढ़ गई चो दोनों की हद से ज्यादा मनमानी
अब तो दोनों बेटों की शादी करने की ठानी
एक दिन हुआ ऐसा एक आए मुल्ला जी बेटे देख सादिक के हो गए थे वो राजी
उनके बेटिया दो थी दोनों खूब सूरत थी
दोनों आलमा थी वो दोनों खूब सीरत थी
जो लिखा है किसमत में वो तो होके रहता
है वक्त पर किसी का ना कोई जोर चलता है
रिष्टे हो गए पक्के हो गई सगाई भी रस्म जो चलानी थी सबने वो चलाई भी
जोनभी की सुननत् को दिल से ना निभाएंगे
अपने खर बनाएगे
वो मुसल्म दोज़ अपने
अपना खर बनाएगे
हम
अपने दोनों लड़कों की हर्कतों से बाज आकर अब इनकी शादी की ठान लेते हैं
और एक दिन ऐसा होता है कि सादिक साहब
के यहां पर एक मुल्ला जी तश्रीफ लाते है
जो दोनों लड़कों को देखकर पसंद भी कर
लेते हैं क्योंकि उनके दो बेटिया थी
जो आलिमा थी और बहुती खुपसूरत थी और दोनों
तरफ से शादी की तैयारिया खूब चल रही हैं
आगे क्या होता है समाद करें
घर में आई खुशिया थी सारा घर मगन रहता
घंठा दिल में सादिक थे पर वो कुछ नहीं कहता
रख गई थी शादी की दोनों की ही तारीखें
हो गई इखटी भी शादी की सब ही चीजें
शादी में नए चोड़े सब ने ही बनाए थे
दूले खुपसूरत सी शेरवानी लाए थे
घर में आ गए
मेहमा हो गई थी हलचल सी
भीनी भीनी फैली थी खुशबू आज संदल सी
दुलहनों को लाने की खूब अब तयारी थी
जानी दोनों लड़कों की थी बरात भारी थी
दोस्त बोले लड़कों से कुछ मजा न पाओगे जब तलग न शादी में रंडिया न चाओगे
बन गए थे मनसूबे अब तो आखो आखो में रंडिया गए लेने दिल्ली बातो बातो में
जो भी जश्न शादी में रंडिया न चाओगे
वो मुसल्म दोजख में अपना घर बनाएंगे
वो मुसल्म दोजख में अपना घर बनाएंगे
देखिये हजराद
शादी की तैयारियां दोनों तरफ खूब चल लही हैं
और दोनों ही घरों में
खुशिया हैं
और दोनों तरफ मेमान तश्रीब ला चुके हैं
लड़के रंडईया लाये रात भर नचायी थी
खूग अपनी शादी में खुशिया इउं मनाई थी
वक्त जब फजर का था
हो रही अजाने थी
मस्जदों में लोगों को अब नमाजे पढ़नी थी
सुनते ही अजान
रंडी नाचने से बाद आई
तब वो दोनों लड़कों ने रंडियात ही हड़काई
बोले थे अजान दिन में पांच बार होती है
शादी जिन्दगानी में एक बार होती है
हो रही अजान है तो तुम अजान होने तो
नाचती रहो यूही तुम ना पैरों को रोको
रंडिया बुझे मन से फिर थिरकनी लगती है
लड़कों के वो कहने पर नाचने वो लगती है
थी नमाज पढ़नी वो
दूबे सारे मस्ती में
खूबु हल्लगुला खा उस घड़ी तो बस्ती में
दीने मुस्तफाई से जो नजर चुराएंगे
वो मुसल्म दो जख में अपना घर बनाएंगे
देखिये सामेइन
वो लड़के जाकर
नाचने वालियों को लियाते हैं और रात भर नाच होता है जब वक्ते फजर
होता है तो जो नाचने वाली थी उनके कान में आजान की आवाज जाती है और
वो अपने पैरो को रोक लेती हैं क्योंकि उन्हें भी अल्ला का खौफ था
वक्ते फजर है और मस्जितों से आजान की आवाज आ रही है
सब लोग नमास पढ़ेंगे तो वो लड़के कहते हैं
कि ये आजान को दिन में पांच मरतबा होती है
ये शादी एकी मरतबा होगी और तुम रोज-रोज नहीं आओगी चलिये नाचिये
वो डराते हैं और धंकाते भी हैं वो नाचने
वाली डर से फिर नाचना शुरू कर देती हैं
लेकिन आगे इनका अंजाम क्या होगा समाथ करें
हो गई सुबा थी जब रंडिया चली दिल्ली
पीछे दोनों लड़कों की गाडिया चली दिल्ली
दिन के बज़ गए थे नौ
हो गया सवेरा था था बड़ा घना कोहरा
लग रहा अंधेरा सा
आगे आगे चलती थी रंडियों की गाड़ी थी
पीछे दोनों लड़कों की चल रही सवारी थी
आ
रहा टिरक था एक
खूब अपनी मस्ती में उसने मार दी टकर लड़कों की थी गाड़ी में
जो हुई थी ये टकर
थी बड़ी
भयानक सी बन गया कुछ उमर था
कुछ बचा ना था बाकी
वो जो दोनों लड़के थे दूला बनने वाले थे
हो गए अचानक वो मौत के हवाले थे
लाशे थी पड़ी दोनों हिलती थी ना डूलती थी
था जिनहें गुमा खुद पर मक्हियां भिनकती थी
राहे हक पे चल करके जो नहीं दिखाएंगे
वो मुसल्म दो जख में अपना घर बनाएंगे
वो मुसल्म दो जख में अपना घर बनाएंगे
जो वो नाचने वाली थी उने ही भी अल्ला का खोप था और वो अल्ला से डरती थी
और अपना पेट पालने के लिए अपने बच्चे पालने के लिए नाचा करती थी
अब सुबा हो जाती है और दिन के 9 बच जाते हैं तो
वो लड़के उन नाचने वालीं को दिली छोड़ने जाते हैं
रास्ते में बड़ा कोरा था अचानक ट्रक से
टक्कर हो जाती है और उनकी मौत हो जाती है
सामेइन देखिये आपने सुना कि अजान की बेहुरमती करने
की इने क्या सजा मिली है और मौत का कुछ नहीं पता
किस वक्त आ जाए और कब हमें अल्ला अपने पास बुला ले
किसी ने कहा है आगाहा अपनी मौत से कोई बशर
नहीं सामान सौ बरस का है पलकी खबर नहीं
अल्ला से डरना चाहिए और उसका नाम लेना चाहिए और अजान का
एहत्राम करना चाहिए और नमास पढ़ना चाहिए आईए सामेइन आखरी
बंद में फैज बदाईमनी सहाब क्या कह रहे हैं समाद करें
लाशे हॉस्पीटल से जब वो दोनों घर आई घर की औरते सारी खूब रोई चिलाई
बापुमाने मुश्किल से अपना दिल समहाला था
उनकी थी पड़ी लाशे जिनको दिल से पाला था
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मर गए सबही अर्माँ ना हुई खुशी पूरी
जिनकी आज शादी थी उठ रहे जनाजे थे
बदनसीबी थी इनकी ये बड़े अभागे थे
जो आजान की दोनों बे घुर्मती नहीं करते
तो आजाब खुदुरत से दोनों ही बचे रहते
चाहे कितनी दौलत हो
तुम घुरूर मत करना रब की बंदगी करना रब से तुम सदा डरना
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